Monday, 19 September 2016

हिन्द की स्पंदन हिंदी ........!·
हिंदी दिवस की सभी गुणीजनों को अनेकानेक शुभकामनायें .... /\…
भारत एक बहुसांस्कृतिक देश है,जहाँ क्षेत्रीय भाषों के साथ -साथ हिन्द के हर कोने में हिंदी बोली और समझी जाती है ........... 14 सितम्बर 1949 को ही हिंदी को देवनागरी लिपि में भारत की कार्यकारी और राष्ट्रभाषा का दर्जा अधिकारिक रूप से दिया गया था, और तभी से देश में 14 सितम्बर का दिन "हिंदी दिवस" के रूप में संपूर्ण भारत वर्ष में मनाया जाता है।

हिंदी भाषा में सुन्दरता बिखरी पड़ी है प्रकृति के अपरिमित और नैसर्गिक सौंदर्य के लिये हिन्दी जलागार जैसी अथाह और गहन है, इसमें करुणा , भाव, शांति, शक्ति, प्रीति और ऊर्जा सभी का समावेश है ......... अश्रु ,स्पंदन, विनोद,भाव सभी रूपों को हिंदी परिष्कृत करती है .........
चहुँओर विस्तृत है "शब्द शक्ति " नभ के कोने सी, बस उचित शब्दों के चयन की आवश्यकता है । हमारे भारत की भूमि की समृद्धिता और हरी- भरी वसुधा के लिए हिंदी भाषा किसी खजाने से काम नहीँ , बहुत से शब्दों का बहुरंगी सौंदर्य और भाव हमें अभिभूत करता है |

शब्दों की मिठास मन में शहद घोलती है । यमक और श्लेष हिंदी भाषा में भरे हुए हैं , उत्तम साहित्य पाठकों की आत्मा में विचार- पुंज जगाते हैं । वैसे भी हमारा भारतवर्ष प्राचीन काल से हिन्दी साहित्य और संस्कृति की खदान रहा है। इतिहास भरा पड़ा है उत्कृष्ट साहित्य और साहित्यकारों से, जिसका रसास्वादन हम आज भी करते हैं, उमंग से भरकर प्रसन्नचित्त होते हैं । हिंदी अमूल्य निधि है हमारी ......... हम सबके लिये .................... :)))

नमन और गर्व हमारी मातृ भाषा पर हिन्दुस्तान वासियों ......
जय- हिन्द, जय- भारत महान ..^^... !!!

Wednesday, 29 June 2016

फादर्स डे पर मेरे और हर पिता को समर्पित ........../\........ !!!
पिता न जाने क्या कह दे और जीवन बदल जाये मेरे पिता बड़े ही आध्यात्मिक, सख्त, स्पष्टवादी और संगीतप्रेमी है, अनुशासन उनकी आत्मा में है I बचपन से लेकर आज भी, पापा की कर्मठता मेरी प्रेरणा -स्रोत रही है |
जीवन में जितना वे तपे है....... उससे कहीं बहुत ज्यादा सुख - समृद्धियाँ से हमारी परवरिश की है | पापा हिमालय से विशाल,अडिग व् कदम -कदम पर उनका नेह सावन की स्नेहमयी बूँदों सा बरसा है हम पर सदैव ।
पिता होते ही ऐसे हैं, जो हमें निर्देश,दिशा ,ज्ञान देते हैं , बिना जताए ,सूर्योदय से पहले उठना सूर्यदेव का आह्वान करना, अच्छा संगीत सुनना, प्रकृति - प्रेम उन्ही से सीखा और आत्मसात कर लिया। .
पापा ऊपर से अखरोट जैसे कठोर, सख़्त पर अंदर से अखरोठ जैसे ही गुणोँ की खज़ाना है, जीवन में नियमबद्धता, अनुशासन, आध्यात्म , सेवा , दान , करुणा , आशा, मदद और निरंतर क्रियान्वय रहने का भाव जीवन में उनसे ही आत्मसात किया।
कभी डरो नही बस आगे " एकला चलो " उन्ही से सीखा वे आज भी २ घंटे कुछ न कुछ पढ़ते है उनने कभी कुछ कहा नही , उन्हें देख ही हम सबने अनुसरण किया। उनका सबसे बड़ा " उपहार " कि हर मोड़ पर जीवन में हम पर भरोसा किया। और हमने भी उसकी गरिमा बनाये रखने का प्रयास किया।
हमेशा वे आज भी यही कहते है "जो करो श्रेष्ठ करो ",संघर्ष करो और अपनी जगह खुद बनाओ , लोंगो को परखने की जगह, विश्वास करो . ....., आज मै जो कुछ भी हूँ उनके अच्छे संस्कार मुझमें है , एक और अच्छी सीख लोंगों को क्षमा करना भी उनसे सीखा वे कहते है.....
" जो झुकते नहीं वे टूटते हैं ".
~~~ वंदना दुबे
हम आत्मावलोकन करें तो पाएंगे कि हमारे जीवन की श्रेष्ठता और मधुरता हमारी नैतिक क्रियाओं ,विचारों और जीवन में आने वाले कठिन कार्यों की का मधुर राग है ।
बीते कल में हमने किन स्वरों का गान किया और आज हम क्या रोपित कर रहे हैं ,हममें कितनी सृजनता, कर्मठता, संवेदनशीलता, करुणा, विवेकशीलता और ताउम्र अन्वेषणशील बने रहने की प्रक्रिया हमें एक सुनहरे आगामी कल का रास्ता दिखाती हैं |
हमने कितने चेहरों पर खुशियाँ बिखेरी ......... तूलिका ने कितने नये रंग रचे ........... लगातार विकसित होना और प्रगतिशील बने रहना......... हममें नयी चेतना का संचार करता है । जिससे निश्चित ही एक "निर्मल आनंद "की प्राप्ति सुनिश्चित है ।
मानव को बस अपने नियम और मान्यताएं तय करने होते हैं ।
=== वंदना दुबे

Thursday, 18 February 2016

अब आ भी जाओ ....!
नव पात -पुष्प
नव लय , नव गान
नवल कण्ठ , नयी तान 
तुम संग
बसंत "" का राग -आलाप
अब आ भी जाओ ....!
खोयी दिशायें
महकी बयारे
बासंती हवाएँ
खिलखिलाई धरा
अब आ भी जाओ ....!
अवनि भी मुस्कायी संग -संग
सरसों भी बौराई हम -संग
जीवन में आ गए हैं सत-रंग
बसन्ती ऋतु"" में हम भी मगन
अब आ भी जाओ ...!
सुगन्धित हुये क्षण -क्षण
झरनों का ये कल-कल
कभी न हो ओझल
मन में नयी उमंग
अब आ भी जाओ ....!
मैं निर्झर सी चंचल
इठलाती
नर्तन करती
और "तुम "
जलागार से 
ग़हन ,अछोर, सौम्य
पर समाहित तो तुम में
ही होना मुझे
और
यही मेरी
नियति भी ..............!!!

Thursday, 17 December 2015

व्याख्या 
'तुम्हारे ,
मनोभावों की 
आज भी वही .... 
-------- 
शनै : शनै :
सम्पूर्ण - समपर्ण
से भी तनिक भी
नहीं हुये द्रवित ....
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फिर क्या शेष !!!
हमारे मध्य
मेरा विश्वास जो
लौह सा शक्तिवान
तुम पर
पर तुम सख्त अप्रणयी ही रहे ....!!!
= प्रेम ===
प्रेम ना बाड़ी उपजे ।
प्रेम ना हाट बिकाय ॥
प्रेम मात्र एक अनुभूति है.....
प्रेम सहज है, पर आसान नहीं,
प्रेम सूर्योदय सदृश्य जिसकी अरुणायी तन - मन को पुलकित, प्रफुल्लित और प्रकाशित करती है ,प्रेम के बदले प्रेम की मनोकामना करना प्रेम नहीं ।
प्रेम दिव्य आनंद की अनुभूति है जो अश्रुओं ,संवेदनाओं ,भावनाओं ,करुणा ,विश्वास और सम्मान से भरा हुआ है आत्मा को छूता है, इसके अहसास से मन की वीणा में यमन की ताने गूँजती हैं , कई बार मौन में भी अपना आभास करा जाता है।
प्रेम उस ऊष्मा के समान है जो प्रत्येक सम्बन्ध में प्रबुद्ध है , प्रेम शुद्ध उत्कृष्ट भाव है प्रेम सरलता और सहजता का व्यापक बोध है , " रिचर्ड बेक " के अनुसार " अपने प्रेम को स्वछंद छोड़ दें यदि वो आपका है तो आपके पास आएगा वर्ना वो आपका कभी था ही नहीं ".... प्रेम की अनंतता , प्रघाड़ता , सरसता , आत्मीयता निशब्द है....जो एक शाश्वत सत्य है मरणोपरांत भी उसकी ख़ुशबू जगत महसूस करता है ....:)))) —