Sunday, 3 May 2020



लॉकडाउन
चहके पंछी
महकी वसुधा
अनुपम विस्तृत -व्योम
लॉकडाउन में !
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निर्मल पुण्यसलिला
झरते रजत - निर्झर
स्वच्छ पथ
अलौकिक सागर
पुलकित कानन
लॉकडाउन में !
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रिश्तों का आभास
व्यंजनों की मिठास
गहरी तन्मयता
बालहठ
केरम - पत्तों- लूडो के
हास- परिहास
रामायण - महाभारत
इस लॉकडाउन में !

Lockdown Pictures | Download Free Images on Unsplashजिंदगी न होगी पहले सी कभी -----

न जाने मुझे क्यूँ
यक़ीन  हो चला है ,
जिंदगी न होगी पहले सी कभी -----
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वो मेले के झूले
ब्याह की  सजावटें
सांध्य संगीत सभाएं
मित्रों के कहकहे !
जिंदगी न होगी पहले सी कभी -----

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मंदिरों की कतारें
करतल ध्वनियों की अनुगूंज
संतो का सानिध्य !
पावों की थिरकन
जिंदगी न होगी पहले सी कभी -----


कुदरत की साज़िशें
मंदिर बंद मदिरालय खुले
जीविका की क्षति
जीवन संघर्ष ख़त्म
एक अज्ञात भय
गुमसुम मन
काल की अनंत पगडण्डी पर
अविराम जीवन क्रिया
 जिंदगी न होगी पहले सी कभी -----


Thursday, 12 March 2020

 पाषाण का दुःख “
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युगों-युगों से
 तप-तप कर 
आंधी -पानी -तूफ़ान 
सह-सह कर 
लोगों का प्यार न पाया 
पाषाण ही कहलाया -------

कभी विभ्राट गिरि 
उत्तुंग हिमशिखर 
कभी विंध्याचल का 
अपलक दर्शन 
नदियों का तात होकर भी 
लोगों का प्यार न पाया 
पाषाण ही कहलाया -------

सरिता तट पर 
शिला बना 
लोगों ने  शीश नवाया 
कभी 
बहुरंगी रत्न बन 
बहुतों का भाग्य जगाया 
आत्मरत्न न बन पाया 
छू -छू  सबने  बहुत सराहा 
पर 
उपमा पाषाणवत की ही मिली 
लोगों का प्यार न पाया ——

रेत बना बिखरा 
और बिखरता चला गया 
नन्हों से हाथों से 
बस 
फिसलता चला,
पाषाण ही कहलाया ------

~~ वंदना दुबे ~~
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मैं बसंती पवन  हूँ !


मैं बसंती पवन  हूँ, 
जाती ठण्ड की 
कुनकुनी धूप  लिए 
फिरूं मैं 
इधर- उधर 
बड़ी मनचली सी---- 
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पीत वसुधा 
पीत कुसुम 
तरुण आम्र की मंजरियाँ 
को करती शोभित 
खिली चमचमाती सब 
मैं बसंती पवन   हूँ -----

कोमल -मधुर हास -विलास 
"बसंत" का आलाप करती 
नव -तरंग छुई -मुई सी 
चपल मैं 
पुलकित करती  सृष्टि 
मैं बसंती पवन  हूँ ------

~वंदना दुबे ~
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Friday, 26 July 2019




फिर सावन का आगमन
श्यामल-श्यामल हुआ गगन
घनरस की धुन गुन-गुन ------

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बूंदों की अपनी शैली
अलबेली सी
अपना राग
अपना आलाप
कभी विलम्बित
मध्य
तो कभी द्रुत लय सा --------

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ऋतुराग मेघ का
छेड़े मन के तार
कहीं अतिवेग
तो रुनझुन भी
लहरों ने पायल खनकायी
सृष्टि शिल्पित हुयी
सजीले सावन में
सावन का आगमन
प्रिय से होगा  मिलन -------

वन्दना  दुबे 

Saturday, 1 June 2019


                                                           -----मुझे मत जलाओ ----

मुझे मत जलाओ ------
मैं जल रही हूँ
विरहाग्नि में
प्रियतम के अकूत प्रेम में
बुला सको तो उन्हें बुलाओ
मुझे मत जलाओ ------

मानवी प्रीति  की अंतिम अभिव्यक्ति
"तुम"
तुम संग मैंने नापा
गगन के व्यास को
आकांक्षाओं के केंद्र तुम
आओ आओ !
स्नेह वर्षा से   भिगो जाओ
मुझे शांत कर जाओ
मुझे मत जलाओ  ------

Monday, 13 May 2019

जब कभी सांझ ढले मैं छत पर जाती हूँ----एक और सूरज अपनी स्निग्ध हँसती धूप से विदा ले रहे होते हैं , तो आदित्य के अनुपम सौंदर्य पर दृष्टि अटक जाती है और मैं अपलक निहारती रह जाती हूँ |    तो दूसरी और आजकल प्रायः तरु भी बांह पसारे तेज़ पवन की अगवानी करते से प्रतीत होते हैं , पाखियों की कतारें गगन संजोती हैं --------    तो कभी रुनझुन सी बारिस की कुछ बूंदे वातावरण को सुरभित कर जाती हैं -----------  पीछे पलट कर देखो तो मयंक की मध्यम सी छवि दृष्टिगत होती है , इस भीषण गर्मी में भी वसुधा के रूप निराले------      मन दूर कहीं दूर चला जाता है तुम संग किये अनवरत -अविरल संवादों की और -------- सच है ना !!! " स्मृतियाँ भी मेहमान की तरह बेपरवाह होती हैं जब चाहे मन के द्वार खटखटाये चली जाती है"  और हम हतप्रद से,  घंटो बीत जाते हैं पता ही नही चलता |  कभी -कभी यूँ लगता है हमारे सारे कार्यों और क्रियाकलापों को सूर्यदेव ही नियंत्रित करते हैं और हम उन्ही के सहारे सारा जीवन जीते हैं तभी तो हम सभी आदित्य उपासक ! एक ही साक्षात ईश्वर जो दीखते हैं  और हम सबको संचालित करते हैं ….|