Saturday, 2 June 2018

सावन आया खुशियां लाया 

हवाओं में सोंधी महक
वसुधा की  कोमल नमी
अमुआ के झूले
बरखा की मीठी फुहार
छेड़े मन के तार
भीगा  मन मेरा भी~~~~


टप -टप
टपाटप,
सघन मेघ
घिर - घिर
कारे -कारे  ~~~~~
मधुर - मधुर
मिया मल्ल्हार की तानों सा
श्रृंगारित हुए पात - पल्लव
वनस्पतियाँ अंगराई लेने लगी
भीगा मन मेरा भी  ~~~~~

सावन प्रकृति के उल्लास का मौसम है. वैसे तो हम ऋतुराज " बसंत"   को कहते हैं, पर मेरी नज़र में सावन भी कुछ कम नहीं | जीवन दायनी सा , काले मेघ नयनाभिराम दृश्य " सावन के झूले हम कैसे भूले" मेंहंदी से रचे हाथ, नव दुल्हनिया मायके की राह देखती....... सावन आते ही रोम-रोम रोमांचित सा हो जाता है, मन गुनगुनाने लगता है सराबोर घनरस से धरा का कोना -कोना दृष्टिगत प्रतीत होता है मानो प्रकृति ने नए परिधान धारण कर लिए हों और नव-अंकुरण को तत्पर-तैयार |

घन घनन घनन
घिर-घिर
घनकाल ( सावन) की घनघोर
रुत आयी .......


हरी भरी है वसुधा
खगों का है मेला,
फिर भी है दिल अकेला
फिर भी है दिल अकेला

सावन प्रेम को जन्म देता है प्रकृति के साथ मिलकर प्रेम -मास भी कहें तो अतिसंयोक्ति नहीं होगी किसी  के साथ बिठाये खूबसूरत लम्हे....... हमें बीते कल की याद दिलाते हैं | मन बरबस भीग जाता है अश्रुओं  से |

तेरी बातें भी सावन जैसी होती हैं,
मुझे अंतर्मन तक भिगो देती हैं

सावन भगवान शिव का महीना भी कहलाता है .. कुदरत की खूबसूरती को बढ़ाने वाला महीना... सावन का ये सुखद   माह परम ब्रह्म शिव का परमप्रिय  महीना भी है... और इसीलिए सावन में शिव की पूजा का विशेष महत्व है... धार्मिक मान्यताओं के अनुसार  सावन में शिव की साधना से मानव  को कई तरह के लौकिक-अलौकिक फलों की प्राप्ति होती है... और कल्याणकारी शिव सावन में अपने उपासकों का हर तरह से कल्याण करते हैं... भगवान शिव शीघ्र  प्रसन्न होने वाले महादेव हैं,  कहा भी गया है शास्त्रों में उनके बारे में ...
"आशुतोष तुम औघड़ दानी"

इस माह में भगवान शिव के 'रुद्राभिषेक' का विशेष महत्त्व है। इसलिए इस माह में, खासतौर पर सोमवार के दिन  'रुद्राभिषेक' करने से शिव भगवान की कृपा प्राप्त की जा सकती है। अभिषेक कराने के बाद बेलपत्र, शमीपत्र, कुशा तथा दूब आदि से शिवजी को प्रसन्न करते हैं और अंत में भांग, धतूरा तथा श्रीफल भोलेनाथ को भोग के रूप में समर्पित किया जाता है।


सावन का महीना और चारों और हरियाली खुशहाली भारतीय वातावरण में इससे अच्छा कोई और मौसम नहीं बताया गया है। जुलाई- अगस्त में आने वाले इस मौसम में, ना  अधिक गर्मी होती है और ना ही बहुत ज्यादा सर्दी।  वातावरण को अगर एक बार हम अलग भी कर लें,   किन्तु अपने आध्यात्मिक पहलू के कारण सावन के महीने का हिन्दू धर्म में विशेष महत्त्व बताया गया है। सावन के अंतिम दिन हर वर्ष रक्षा बंधन भाई -बहन के अटूट प्रेम का पर्व है |


सावन माह के बारे में एक पौराणिक कथा है कि- "जब सनत कुमारों ने भगवान शिव से सावन महीना प्रिय होने का कारण पूछा तो भगवान भोलेनाथ ने बताया कि “जब देवी सती ने अपने पिता दक्ष के घर में योगशक्ति से शरीर त्याग किया था, उससे पहले देवी सती ने महादेव को हर जन्म में पति के रूप में पाने का प्रण किया था। अपने दूसरे जन्म में देवी सती ने पार्वती के नाम से हिमाचल और रानी मैना के घर में पुत्री के रूप में जन्म लिया। पार्वती ने युवावस्था के सावन महीने में निराहार रह कर कठोर व्रत किया और शिव को प्रसन्न कर उनसे विवाह किया, जिसके बाद ही महादेव के लिए यह विशेष हो गया”।

वैसे सावन की महत्व  को दर्शाने के लिए और भी अन्य कई कहानी बताई गयी हैं जैसे कि मरकंडू ऋषि के पुत्र मारकण्डेय ने लंबी आयु के लिए सावन माह में ही घोर तप कर शिव की कृपा प्राप्त की थी।

कुछ कथाओं में वर्णन आता है कि इसी सावन महीने में समुद्र मंथन किया गया था। मंथन के बाद जो विष निकला, उसे भगवान शंकर ने पीकर सृष्टि की रक्षा की थी।

किन्तु कहानी चाहे जो भी हो, बस सावन महीना पूरी तरह से भगवान शिव जी की आराधना का महीना माना जाता है। यदि एक व्यक्ति पूरे विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा करता है, तो यह सभी प्रकार के दुखों और चिंताओं से मुक्ति प्राप्त करता है।सावन के महीने में भक्त, गंगा नदी से पवित्र जल या अन्य नदियों के जल को कामड़ में कन्धों पर रख  मीलों की दूरी तय करके लाते हैं और भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। कलयुग में यह भी एक प्रकार की तपस्या और बलिदान ही है, जिसके द्वारा देवो के देव महादेव आशुतोष  को प्रसन्न करने का प्रयास किया जाता है।

Wednesday, 15 November 2017



"सपने"
उनींदी चक्षुओं 
के स्वप्न, 
अलौकिक-आलोक प्रभात का,
कल -कल पावस अमृत धारा 
भागीरथी की 
नर्तन करती प्रभाकर की किरणों संग 
भैरव की मधुर तान 
तुम संग मौन अभिव्यक्ति
फिर जगा गयी मुझे 
आखें खुली तो 
बस स्वप्न था......... बस स्वप्न था ....... यथार्थ दूर बहुत दूर था ...........
"सपने" हज़ारों साल से कौतूहल बने हुए हैं .... हज़ारों साल से इनपर शोध हो रहा है, पर पहेली 
उतनी ही गूढ़ रहस्य और उलझी गुत्थी बनी हुयी है ....... आज भी विज्ञान-विधा के लिए, उतनी ही अनबूझ पहेली। बंद नयनों के पीछे कई स्वप्न उभरते हैं| 
"नयन खुले तो स्वप्न अधूरा"
स्वप्न का रिश्ता भूत, भविष्य और वर्तमान सभी से सामान होता है, जैसी सोच होती है, सपने भी उन्ही को साकार करते हैं, रंग बिरंगे मधुर सपने, गुलों पर ओस की बूंदों से नाजुक,सुमन से महकते, विरह में तड़फते , जीवन के हर रस से रचे ~ रंगारंग !!
जिन ख़्वाबों का हम सचेतन अवस्था में गला घोट देते हैं, उन ख़्वाबों को हम सुप्तावस्था में सच होता पाते हैं। हमारे पुराणों में भी विदित है कि केवल मानव जाति ही स्वप्न का आनंद उठा पाती है। स्वप्न में अपने आराध्य/ प्रियतम/ स्नेही जन के दर्शन से मन पुलकित हो उठता है। कभी हम काम के बोझ से थके हों तो सुहाने सपने मन को आत्म-विभोर कर देते हैं........... हर सपना कुछ कहता है, स्वप्न के सार को समझना गूढ़ कला है।
हर स्वप्न कुछ-न कुछ कहता है। कुछ सपने जीवन में खुशियों की लहर भर देते हैं। तो कुछ उदास कर देते है हमें! 
सपनों का सीधा संबंध अंतर्मन से होता है। माननीय अब्दुल कलाम ने भी कहा है
" सपने वही जो आपको सोने न दें "
बहुत से लोंगों का सपना अमीर/ खिलाड़ी / गायक / वादक या बड़े ओहदे पर कार्य करने का होता है, सबके सपने अलग-अलग,......... माँ- बाप को भी बच्चों को स्वयं निर्णय लेने देना चाहिए , हाँ हानि - लाभ आप समझा सकते हैं क्योकि आपने जीवन जिया है अनुभव बाँट सकते हैं पर उनकी रूचि आहत न हो ,अपने मन के काम से बच्चे अपने काम के प्रति अति-उत्साही होंगें ऊंचा मुकाम हासिल करेंगे |
,हमेशा मन की आवाज़ सुने अपने पसंद का काम करें स्वयं हमें तय करना है स्वप्न को हकीकत का रूप देने के लिए प्रत्नशील होना होगा अपने सपने को अपना जूनून बनाना ही सफलता का रास्ता दिखाता है अपने स्वयं के सपने साकार करें, नहीं तो कोई और अपने सपनों को साकार करने के लिए आपको काम पर रख लेगा |
सपना पूरा करने के लिए आत्मविश्वास स्वयं में पैदा करें और उसे जीवंत रूप देने के लिए अंतिम समय तक जूझते रहे सफलता निश्चित आपको शिखर तक पहुंचाएगी |
जब हम नींद में होते है, तब हमारी देह अंतर मन से अलग होती है क्योंकि आत्मा कभी सोती नहीं। जब मानव शयनावस्था में होता है तो उसकी पाँचों ज्ञानेंद्रियाँ उसका मन सुप्तावस्था में तल्लीन और व्यक्ति का मस्तिष्क पूरी तरह शांत रहता है।सपने हमारे दिमाग में चल रही तस्वीरों, भावनाओं और विचारों से बनते हैं...... सपने हमारे अवचेतन मन की उपज होते हैं, इसलिए उन्हें समझना बहुत जटिल होता है. कई सपने हमें कुछ संकेत भी देते हैं. यह संकेत आपके अतीत या भविष्य से भी जुड़े हो सकते हैं. दिमाग की गहराइयों में छुपे भाव और डर भी सपनों का रूप ले लेते हैं. यह हमें मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के बारे में भी बहुत कुछ बताते हैं|
सपने तो सपने 
कब कहाँ अपने 
आँख खुली तो गायब 
और 
रीते हम.......
उस अवस्था में व्यक्ति को एक अनुभव होता है, जो उसके जीवन से संबंधित होता है। उसी अनुभव को स्वप्न कहा जाता है। स्वप्न के सम्बन्ध में कई भ्रांतियाँ भी है जिन्हें हम शुभ- अशुभ का सूचक मानते हैं।
१) सपने में खिले हुए गुलाब के फूल देखने से मनोकामना पूर्ण होती है।
२) पतंग उड़ाना -व्यापार में लाभ।
३) सपने में रसभरे फल खाना अत्यंत शुभ माना गया है।
४) मक्खन - यह प्रसन्नता का सूचक है।
सपनों को ऊंचाई दो, नभ की विशालता दो, अचेतन मन कि मीठी फुहार है, कोई सीमा नही, कोई बंधन नही...... सपनों के संग हम आज़ाद होते हैं.......... उड़ सकते हैं ~~~ चहक सकते हैं **** ख़्वाबों में जी सकते हैं, गहन वन में घूम सकते हैं--------- खुश रहिये, पुलकित रहिये और खूब सपने देखिये। मैं दुआ करूंगी की सबके सवप्न यथार्थ में रूपांतरित हो /\
वंदना दुबे

Thursday, 28 September 2017

चल चले जहां!
प्राची में उदयोन्मुख
किरणें
व्योम-लालिमा, 
जलनिधि को आलोकित करती
जलराशि में नर्तन करती
निहारे संग-संग पाँव जल में डाल
शांत जल को बिखरायेंगे ..... !
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चल चले जहां!
मलय तरु सुगंध
पवन में विलय
हो जाती हो......
क्षण -क्षण जन-जन को
आनंदित कर जाती हो .... !
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हिमाच्छादित पर्वत मालाएँ,
भीमपलासी की तानों संग
जहां देवदार बातें करते हैं
वसुधा से.....
बांह पसारे अनगिन झोके
चकित नयन
चल चले वहां ........!
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"गोमुख " की पावन
धारा में
हिम-शिखरों से श्रृंगारित
भू हो
भागरथी का
निर्मल-कलकल.... छलछल-अविरल जल
अरण्य को नित जलपान कराय रे..... !
चल चले वहां
बस मन वहीं रम जाए रे ....!!!
~~ वंदना दुबे ~~

Thursday, 1 June 2017

हंसीं में छुपी जीवन की ख़ुशी “ ===================
" छोटी सी हँसी
बड़ी है ख़ुशी
हर गम की दवा
जिसके आगे न कोई टिका..."
ख़ुशी में छिपा है जीवन का " निर्मल आनंद" अनंत समस्याओं का निदान और समाधान .......मुस्कराहट से ...........मुस्कराहट हमें सहजता, सरलता, सुंदरता और आत्मविश्वास से भर देती है, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, तनाव और भी अनेक रोगों को दूर भगाने के लिए हँसी राम बाण औषधि है, तनाव, चिंता, डर, गुस्सा, अधीरता आदि नकारात्मक प्रवृतियों से हमारी चयापचय क्रिया प्रभावित होती है , अन्तःस्त्रावी ग्रंथियां ठीक से काम नही कर पाती है | क्रोध से विषैले तत्व जन्म लेते है जो हमें अशांत रखते है व शरीर के लिए हानिकारक भी हैं | हास्य चिकित्सा से शरीर में विजातीय तत्वों का निष्कासन के साथ- साथ सकारात्मक विचारों का आगमन होता है |
हंसना और मुस्कुराना सरलतम प्रक्रियाएं है |जो हमारे साथ साथ सामने वालों को भी लाभान्वित करती हैं |
प्रसन्नता को हम प्रकृति में ऋतुराज वसंत की भी उपमा देते हैं " बसंत " में धरा अलंकृत हो मुस्कुराती है जो वसुधा के शृंगारित और हर्षित होने का सूचक है |
अवनि भी मुस्काई हम संग
सरसों भी बौराई संग संग
जीवन में छा गया "बसंत "
हंसना सहज प्रक्रिया है जो हमारे व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाती है ये एक ऐसी ऊर्जा " ज्यों खर्चे त्यों -त्यों बढ़े " के सिद्धांत पर चलती है........ हम स्वस्थ, हमारा रक्त संचार बढ़ेगा रक्त- परिभ्रमण अनुकूल होगा ..... ऑक्सीजन का अवशोषण बढ़ेगा विषैले तत्वों का निष्कासन तेजी से होगा ......नई ऊर्जा का संचार जो स्वास्थ्य के लिए उत्तम ....... हँसने से अंग- अंग फुर्तीले और शक्ति से भर जातें है, जिससे हमारी कार्यक्षमता में उत्तरोत्तर वृद्धि होती है | हँसी मनुष्य का नैसर्गिक गुण है हंसने से शुभ विचारों का प्रादुर्भाव होता है नकारात्मकता समाप्त होती है, मुस्कराहट मानव को शृंगारित ही नही करती सौंदर्य और सकारात्मक उष्मा से भी भरती है |

हंसने से चेहरा ओजवान ,स्फूर्तिवान , मननशील बनता है, सौहाद्रता और भाईचारा बढ़ता है, हँसते हुए कहे गए कटु वचन भी लोग हँसी में उड़ा देते हैं बड़े से बड़े बिगड़े हुए काम भी मुस्कुराने से बनते प्रतीत होते हैं |
जगत में सभी जन मोहक खिले सुमन सदृश्य मुस्कुराते रहे हँसते रहे तभी जीवन सफल, सरल और हम निरंतर आशावादी बने रहते हैं तो फिर हँसिये हँसाइये खुशियां बिखराइये। ...........आमीन....^^.....!!!
वंदना दुबे

Sunday, 16 April 2017

शिवपुत्री चिरकुंवारी "माँ रेवा" ( नर्म + दा =आनंददायनी) अमरकंटक से भई प्रगट अनुपम रूप निराला जन-जन चकित होये जाए रे....!
तेरा निर्मल -पावन सलिल, गांव -गांव से कानन -कानन कल-कल बहता जाए रे ...!
आनंददायनी, जीवनदायनी, अमृतप्रदायनी, मोक्ष प्रदायनी वेद -पुराण बताये रे ....!
जगत में प्राचीन काल से ही वसुधा सदैव पूज्यनीय रही है पूर्वज हर उन चीजों को पूजते थे, जिसे वह जीवन के लिये जरूरी मानते थे.. हमारी भारतीय संस्कृति में भी हम नदियों को माता और शिखरों को पिता समतुल्य मानते आये हैं |
मेरे बचपन के कुछ वर्ष "मंडला" में बीते पापा की पोस्टिंग थी वहां, जहां नर्मदा तीन और से घिरी हुयी है, मंडला का " हनुमान घाट" नितांत एकांत घनी अमराई से आच्छादित....... मेरा प्रिय स्थल था प्राथमिक शिक्षा मंडला में हुयी थी, आज भी चलचित्र से वे दिन मुझे कभी नही भूलते हैं ...........घाट पर घंटो पानी में पैर डालकर बैठना और अथाह , अविरल जल को अनवरत निहारना बचपन से आज तक पसंद है......... आज भी जब भी मंडला जाते हैं, “सहस्त्र धारा और हनुमानघाट “ जाना नहीं भूलती | पावन माँ नर्मदा के अद्भुत दर्शन से मस्तक श्रद्धा से झुक जाता है तब से ही एक गहरा लगाव उसके प्रति होता चला गया।
"कलकलनिनादिनि दुखनिवारिणि शांति दे माँ नर्मदे"
अमरकंटक से निकलने के बाद मंडला पहला बड़ा शहर जहां माँ नर्मदे विशाल रूप में अथाह जलराशि के साथ दृष्ट्रिगत होती हैं सबसे स्वच्छ जल भी उनका यहीं है , इसके बाद जबलपुर में " धुआँधार जलप्रपात" का विहंगम दृश्य......... ऊपर से नीचे देखने पर धवल-जल उबलता सा प्रतीत होता है, इतनी तीव्रता और वेग के साथ निर्मल जल ऊर्जा से भर देता है हमें .......ऊपर उठता धुँआ हमारे मस्तक के साथ-साथ अंतर्मन तक भिगो जाता है, देख सब हर्षित होते हैं |


नर्मदा जल में प्रवाहित लकड़ी एवं अस्थि कालांतर में पाषण रूप में परिवर्तित हो जाती थी नर्मदा अपने उदगम स्थान से लेकर समुद्र पर्यन्त उतर एवं दक्षिण दोनों तटों में,दोनों और सात मील तक धरा के अंदर ही अंदर प्रवाहित होती हैं , पृथ्वी के उपर तो वे मात्र दर्शनार्थ प्रवाहित होती हैं |
नर्मदा के "कंकड़ में शंकर" ऎसी मान्यता है नर्मदा में वर्ष में एक बार गंगा आदि समस्त नदियाँ स्वयं ही नर्मदा जी से मिलने आती हैं | नर्मदा राज राजेश्वरी हैं वे कहीं नहीं जाती हैं | " नर्मदे तत दर्शनाथ मुक्ति "
नर्मदा में समस्त तीर्थ वर्ष में एक बार नर्मदा के दर्शनार्थ स्वयं आते हैं | नर्मदा ही एक मात्र ऐसी देवी (नदी )हैं ,जो सदा हास्य मुद्रा में रहती है | आशुतोष (शिव ) ने ही उनका नाम "'नर्मदा " रखा था शिवपुत्री के अतिरिक्त " इला " नाम की शक्ति से भी सम्बोधित किया जाता है | नर्म = आनंद दा = देती रहो ( आनंदप्रदायनी )
असंख्य आस्थावान जनों को प्रत्यक्ष रूप से जीविका और आनन्द देने वाली नर्मदा के नाम से सबसे अधिक प्रसिद्ध है। नर्मदा की उत्पत्ति पुराणों के अनुसार भगवान शंकर की जटाओं से होने के कारण इनका नाम "जटाशंकरी" और "शिव पुत्री" के नाम से "भी विख्यात हैं |
"पुण्या कनखले गंगा, कुरुक्षेत्रे सरस्वती ग्रामे वा यदि वारण्ये, पुण्या सर्वत्र नर्मदा"
मत्स्यपुराण में नर्मदा की महिमा इस तरह वर्णित है -‘कनखल क्षेत्र में गंगा पवित्र है और कुरुक्षेत्र में सरस्वती। परन्तु गांव हो चाहे वन, नर्मदा सर्वत्र पवित्र है। यमुना का जल एक सप्ताह में, सरस्वती का तीन दिन में, गंगाजल उसी दिन और नर्मदा का जल उसी क्षण पवित्र कर देता है |
एक लोक गाथा के अनुसार नर्मदा और शोण भद्र की शादी होने वाली थी। विवाह मंडप में बैठने से ठीक एन वक्त पर नर्मदा को पता चला कि शोण भद्र की दिलचस्पी उसकी दासी (जुहिला) यह आदिवासी नदी मंडला के पास बहती है........ में अधिक है। विवाह मंडप से उठकर उनने आजीवन कुंवारी रहने का फैसला लिया भौगोलिक सत्य देखिए कि सचमुच नर्मदा भारतीय प्रायद्वीप की दो प्रमुख नदियों गंगा और गोदावरी से विपरीत दिशा में बहती है यानी पूर्व से पश्चिम की ओर जो इस कहानी को सत्य साबित करती है |

एक दूसरी कथा....... राक्षस सहस्त्र बाहु उन्हें अपने बस में करना चाहता था उनले बहाव को रोकना चाहता था, उनसे बचने के लिए वे "सहस्त्र धारा " बनकर निकल गयी और उसे शापित कर काला पाषाण बना दिया ये दर्शनीय स्थल " सहत्रधारा " के नाम से विख्यात है , राक्षस सहस्त्र बाहु भी काले पत्थर के रूप में विराजित हैं |

गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती। नर्मदा सिन्धु कावेरी जलेस्मिन सन्निधिं कुरु।। चिरकुंवारी नर्मदा .............
माघ मास के शुक्लपक्ष की सप्तमी तिथि को नर्मदा का आविर्भाव होने से प्रति वर्ष इस तिथि में नर्मदा जयन्ती बड़े धूमधाम से मनायी जाती है.। १३०० कि०मी० लम्बी धारा में एक साथ लाखों दीपक छोड़े जाते हैं तब एक स्वर्ग जैसा दृश्य दिखाई देता है। लाखों लोग श्रृद्धापूर्वक एकत्रित होकर "माँ रेवा" की आरती करते हैं.। होशंगाबाद जिसका पौराणिक नाम नर्मदापुरम् में नर्मदा जयन्ती का उत्सव अत्यन्त बृहद् स्तर पर आयोजित किया जाता है। सप्त सरिताओं की पवित्रता और स्नान की पावनता का बोध कराती है नर्मदा के उदगम अमरकण्टक से लेकर सागर संगम खम्बाद की खाड़ी तक असंख्य तीर्थ स्थल हैं।
माँ की महिमा और व्यापकता का यशोगान करना मेरा छोटा सा प्रयास है आप सब पढ़ें |
Vandana Dubey

Saturday, 10 December 2016

"मैं उड़ना चाहूँ "

अपनी जिंदगी अपनी स्त्रियों ...... अपनी उड़ान...... अपना मुकाम..... अपनी पहचान ...... अपने अरमान.......
ये शब्द सुनने में जितने मोहक प्रतीत होते हैं असल जिंदगी और समाज में उतने ही कठिन कोई भी व्यक्ति अपने मुताबिक़ कहाँ जीवन व्यतीत कर पाता है, सामाजिक दायरे से बाहर हर क्षण कोई क्या कहेगा, कोई क्या सोचेगा, अपने को "स्टेनलेस" साबित करने के अथक प्रयास ...... इन्ही विचारों में ग़ुमसुम सी पल-पल चलती और कटती जिंदगी .....!!!
स्त्रियों की हालत तो समाज में और भी नाजुक "बहुत कठिन है डगर जीवन की" हर पग सम्भाल कर रखना पड़ता है। हर उम्र में........बचपन में माँ बाप का डर, युवावस्था में पति का, और वृद्धावस्था में बच्चों का, बंदिशें ही बंदिशें और दायरे सामजिक व्यवस्था ही जवाबदेह है समाज पुरुषसत्ता ,या पितृसत्ता के नियमों पर ही चलता है....... जीवन उतना ही दुरूह यानि पुरुष के मदद के बगैर उसका जीवन बेमानी है| समाज भी अच्छी नज़रों से नहीं देखता, कि कोई कमी होगी तभी अकेली जी रही है। पुरुष तो पुरुष औरतें भी यकीन नहीं कर पाती कि अकेली लड़की खुशहाल जीवन कैसे जी सकती है।
पुरुष की सोच में अकेले रहने का निर्णय अपनी इच्छा से हो ही नहीं सकता वे मान बैठते हैं की शादी टूटी होगी , या कोई बड़ी अप्रत्याशित दुर्घटना , अनहोनी हुयी होगी " बेचारी " शब्द की उपमायें देने से भी नहीं चूकते। अकेले रहकर जो रहना चाहती हैं अपने कार्यों को पूरी तल्लीनता ,और तत्पर होकर सम्पादित करती हैं। बाकी जिंदगी में उनके कथनानुसार न कोई तनाव , न झंझट, न डर , न कलह , न परिशोध मन का काम , अपने तरीके और सलीकेऔर समय से रहना।
हम ये मानते हैं कि विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण सहज ही होने वाली प्रक्रिया है। हाँ पर ये बिलकुल आवश्यक नहीं की ये आकर्षण दैहिक ही हो, स्वाभाविक है भावनात्मक साथ के सहारे के लिए भी आकर्षण हो सकता है अच्छे और सच्चे मित्र के रूप में। मित्र की चाहत का अर्थ ये कदापि नहीं कि महिलाओं की हस्ती ख़त्म ,और वे अकेले जीवन यापन नहीं कर सकती हैं।अकेली औरत के अस्तित्व को पुरुष प्रधान समाज कभी नहीं अपनाएगा सामाजिक और मनोवैज्ञानिक उपज है। इस प्रकार की सोच और बदलाव को समाज आने में युग लगेगा अभी।
मूलरूप से हमारी संस्कृति ही और सामजिक ढांचा यह सम्पूर्ण रूप से जवाबदार है मानव की ऐसी संकीर्ण सोच के लिए। लता मंगेशकर,क़्वीन एलिज़ाबेथ, हार्पर ली, मदर टेरेसा और अन्य भी अनन्य विभूतियाँ हैं जिन्होंने अपने क्षेत्र में सर्वोच्चता हासिल की और अमरत्व तत्त्व से विभूषित हुए। राहें कठिन हैं, सरल नहीं, आसान नहीं पर असम्भव भी नहीं। वैदिक काल में भी जितने भी देवता थे तो देवियाँ भी अम्बा, सरस्वती , शाम्भवी , वैदेही, ब्रह्माणी आदि पावनता, धन, शक्ति, ज्ञान, चारित्रिक विशेषता और रूपता के लिए प्राचीन काल से पूजी जाती रही हैं। नदियों की और देखें तो शिव -पुत्री माँ नर्मदा "कुंवारी हैं जिनके सम्बन्ध कहा गया है.......... "नर्मदे तत दर्शनाथ मुक्ति " "नर्मदे सिन्धु कावेरी जले अस्मिन् सन्निधिम् कुरु " कुंवारी महानतम हस्तियां गंगा में स्नान कर और नर्मदा के मात्र दर्शन से ही मानव मोक्ष प्राप्त करता है।
नारी आज भी सेक्स सिंबल के रूप में जानी जाती है उसकी प्रबुद्धता कम ही आंकी जाती है , हम विज्ञापन जगत में भी देखें तो हर उत्पादन में प्रचार -प्रसार के लिए नारी देह ही परोसी जा रही है। यू एस के आंकड़े भी इसकी पुष्टि करते प्रतीत होते हैं ९९% महिला सेक्रेटरी और ९७% फ़ूड सर्विसिंग में वीमेन वर्कर, साथ ही उन्हें वेतन भी कम ही मिलता है पुरुषों की तुलना में....... । पुरुष महिलाओं को घर -गृहस्थी में ही सीमित रखना चाहता है उसकी आकांक्षायें और अभिलाषायें अधूरी रह जाती हैं। एक जुट होकर हमें जूझना ,लड़ना, तपना और निखर कर बिखरना होगा.......... तभी हम खुले अम्बर में धरा पर सांस लेकर उड़ सकेंगे, आशातीत सफलता हासिल कर हर्षित होंगे, हमारा कार्य गगनरूपी ऊँचाइयाँ प्राप्त करेगा हर्षित हमें मनोवांछित सफलता मिलेगी।
वंदना दुबे

Monday, 19 September 2016

हिन्द की स्पंदन हिंदी ........!·
हिंदी दिवस की सभी गुणीजनों को अनेकानेक शुभकामनायें .... /\…
भारत एक बहुसांस्कृतिक देश है,जहाँ क्षेत्रीय भाषों के साथ -साथ हिन्द के हर कोने में हिंदी बोली और समझी जाती है ........... 14 सितम्बर 1949 को ही हिंदी को देवनागरी लिपि में भारत की कार्यकारी और राष्ट्रभाषा का दर्जा अधिकारिक रूप से दिया गया था, और तभी से देश में 14 सितम्बर का दिन "हिंदी दिवस" के रूप में संपूर्ण भारत वर्ष में मनाया जाता है।

हिंदी भाषा में सुन्दरता बिखरी पड़ी है प्रकृति के अपरिमित और नैसर्गिक सौंदर्य के लिये हिन्दी जलागार जैसी अथाह और गहन है, इसमें करुणा , भाव, शांति, शक्ति, प्रीति और ऊर्जा सभी का समावेश है ......... अश्रु ,स्पंदन, विनोद,भाव सभी रूपों को हिंदी परिष्कृत करती है .........
चहुँओर विस्तृत है "शब्द शक्ति " नभ के कोने सी, बस उचित शब्दों के चयन की आवश्यकता है । हमारे भारत की भूमि की समृद्धिता और हरी- भरी वसुधा के लिए हिंदी भाषा किसी खजाने से काम नहीँ , बहुत से शब्दों का बहुरंगी सौंदर्य और भाव हमें अभिभूत करता है |

शब्दों की मिठास मन में शहद घोलती है । यमक और श्लेष हिंदी भाषा में भरे हुए हैं , उत्तम साहित्य पाठकों की आत्मा में विचार- पुंज जगाते हैं । वैसे भी हमारा भारतवर्ष प्राचीन काल से हिन्दी साहित्य और संस्कृति की खदान रहा है। इतिहास भरा पड़ा है उत्कृष्ट साहित्य और साहित्यकारों से, जिसका रसास्वादन हम आज भी करते हैं, उमंग से भरकर प्रसन्नचित्त होते हैं । हिंदी अमूल्य निधि है हमारी ......... हम सबके लिये .................... :)))

नमन और गर्व हमारी मातृ भाषा पर हिन्दुस्तान वासियों ......
जय- हिन्द, जय- भारत महान ..^^... !!!