Wednesday, 20 August 2014

अपनी यादें बोकर
तुम नित
पुष्पित पल्लवित फलित होने लगे हो
मन के आँगन में
छेड़ गये "यमन " की ताने ....


जब - जब भी मिलते हो
खूब खिलखिलाते हो ,
ज़रा ये भी बताओ हमें
इतनी खुशियाँ कहाँ से
बटोर लाते हो !!!
अरुणोदय मुझे पसंद है
तुम्हारी याद दिलाता है।
एकांत मुझे पसंद है
तुम्हारे स्वप्न दिखाता है। 
ये वसुंधरा !!!
तो स्वर्ग है
इसके हर रूप - रंग में
दिल में ब
से रहते हो
बसे रहोगे युगों - युगों तक ....... 


सर्द सर्द शिशिर
की ठिठुरती रातों में
जब सहसा नींद ख़ुलती है !!!
तो एक तेरा अहसास
नींद उड़ा ले जाता है
और ताप से भर देता है
मुझे गुनगुनी धूप जैसे .....:))))

एक अपूर्व धुन ~~~~
तुम्हें पाने की लालसा
ने ली फ़िर अंगड़ाई ,
रोमांचित कर गयी मुझे ………

तुम संग ,
तरंगिणी तट पर
सांध्यप्रकाश की
मनोहारी बेला में
वक़्त बिताने का मन ………


तुम्हारी और मेरी
उलझी हथेलियाँ
उनकी ऊष्मा ~~~~~~
और अंकुरित होता प्रेम ………

तुम्हारे स्पर्श का
वह सुकोमल एहसास
हरसिंगार के फूलों सा
जनम - जनम तक ..........

कि मेरी तंद्रिल आँखों से
गरम - गरम आंसूं
फ़िर चूने लगे।

~~~~ वन्दना दुबे ~~~~
 —
हे दिवाकर देव !!!

शिशिर निशा काल का अंत
गहन गिरि कानन
और उपवन में
श्यामल गगन को 
अपने तम और प्रकाश पुंजों से
परिष्कृत कर दो
हे दिवाकर देव !!!


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प्राची के महाद्वार से
सवेरे - सवेरे
सूर्य का रथ तेज़ी से निकले
पवन सहलाये
कपोल "प्रियतम " के
स्वप्न स्नेह के टूटे
तुम्हारी किरणों से
सुन्दर सुकुमार देह
खोले नयन
तुम्हारी आभा
से सुदूर सागर किनारे
हे दिवाकर देव !!!

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समीर तेरे प्रतिकर्षण से
मैं तुम्हें छू लूंगी
उनकी मध्धम - मध्धम
मलयानिल महक
का अभिसार कर लूँगी
" प्रियतम"
को आत्मसात कर लूँगी !
आरम्भ से ही
गोचर होकर रहे अगोचर ........


=== वंदना दुबे =

जब क्षितिज की सिन्दूरी लालिमा
जलनिधि को अलंकृत करती
चमकती रश्मियाँ तन - मन भिगोती
श्वेत पाँखिओं की कतारें
आसमां सँजोती ........

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पूनम की साँझ में
ज्वार - भाटे सी
तुम्हारी यादें
सिन्धु की तीव्र लहरों जैसी
मेरे मुख मंडल को
क्षण - क्षण छेड़ जाती
रोम - रोम सहर जाता है.........

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सहेजना चाहती हूँ
इन पलों को मैं हाथों में
तो हथेली में आ जाते हैं
गोमती चक्र , शंख , सीप ,
अनेक समुद्री रत्न..........

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यादों के झरोखों से
गुजरा वक़्त फ़िर याद आ जाता है ,
नैनों के कोरो को
नम कर जाता है
अश्रु लड़ी निकल जाती है
इक बीती हुयी शाम
चलचित्र सी.........

वंदना दुबे
 — 
मन झूम - झपाक - झमझम
झंकृत हो उठता है
" झिंझोटी " की ताने
गुनगुनाता है ......
जब तुम मुझे "सुंदर " कहते हो
अपने पे ग़ुमान हो जाता है

सर्वांग अलंकृत हो जाते हैं ।


बिहान भये नित
निर्मल बयार बहती
उषा के आँचल फैलाते ही
झरोखों से,,,,,,

उदय की सुनहरी रश्मियाँ
मेरे मुख मण्डल को चूमती थी
मुझे सहलाती थी
जगाती थी ,,,,,,,,

पर इन दिनों
शीतल - शीत ऋतु में
मोटे कोहरे की सफ़ेद चादरों ने
मेरे अरुण को जाने कहाँ छुपा लिया है
अरुणिमा खो गयी कहीं
ना जाने कब लौटेगी ,,,,,,,

,,,,, वन्दना दुबे ,,,,,,
आशा विश्वास हमारे तुम
जीवन प्रभात हमारे तुम
सुनहरी सांझ हमारे तुम
मीठे स्वप्न भी तुम संग .




जब सुबह सुहानी होती है 
परिन्दों की कतारे
 अम्बर संजोती है ,
सिन्दूरी किरणें
तरंगिणी को अलंकृत करती है ,,,,,,

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तन है गीला
मन है सूखा 
मैं कंकाल सा तरु
 सलिलमय हूँ ,,,,,,

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फ़िर भी
अंतरमन तक प्यासा 
छिन्न - भिन्न
अंग - अंग
 अस्तित्व विहीन निर्जीव सदृश्य ,,,,,,

वंदना दुबे