Wednesday, 20 August 2014

आशा विश्वास हमारे तुम
जीवन प्रभात हमारे तुम
सुनहरी सांझ हमारे तुम
मीठे स्वप्न भी तुम संग .




जब सुबह सुहानी होती है 
परिन्दों की कतारे
 अम्बर संजोती है ,
सिन्दूरी किरणें
तरंगिणी को अलंकृत करती है ,,,,,,

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तन है गीला
मन है सूखा 
मैं कंकाल सा तरु
 सलिलमय हूँ ,,,,,,

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फ़िर भी
अंतरमन तक प्यासा 
छिन्न - भिन्न
अंग - अंग
 अस्तित्व विहीन निर्जीव सदृश्य ,,,,,,

वंदना दुबे 

मेरे प्रिय रागों के
आरोह
अवरोह समतुल्य
क्षण - क्षण
समाहित हो रहे
मेरे जीवन में 
तुम
शनै : शनै 



सिंदूरी सूरज
सुबह - सुबह
तुम सदृश्य
अपूर्व सौंदर्य भरपूर 
वही नूर
वही गुरुर
हमसे कितनी दूर
जैसे तुम
सुदूर~~~~

यादें ....

तेरी याद मेरे दिल में
मेरे सासों जैसी
पल - पल साथ ------------
तेरी बातें
सागर की लहरों जैसी
छूकर मेरे पैरों को
रोमांचित कर
लौट - लौट जाती है ...

यादें हमारी जेहन ख़जाने की तरह होती हैं.... यादों की दस्तक दिलों - दिमाग से जुदा नही होती ताउम्र .....हम जिन्दगी यादों में तलाशते रह जाते हैं ....इन्हें समेटने और सहेजने का कभी प्रयास नही करना पड़ता ....
दिल के किसी कोने में घर किये होती हैं .....बाँवरा मन ही तय करता है किन्हें संजोना है और किन्हें भुलाना ......

यादों के भी दो रूप होते हैं
१ . व्यक्तिगत
२. सामूहिक

सामूहिक यादें हमें समाज , सभ्यता ,और वंश से जोड़े रहती हैं वहीं व्यक्तिगत मन को पुलकित ,प्रफुल्लित ,उत्साहित और जीवन्तता प्रदान करती हैं सुंदर समृतियों को मन जीवन पर्यन्त संजोये रखता है हर घटना , रचना , तस्वीरें अपना डेरा जमाये रहती हैं और मीठी ,खट्टी अनुभूति हमें अनुभव कराती रहती है .....बेहतरीन लम्हों ,तस्वीरों ,जगहों पर हम कभी मुस्कुराते है या अश्रु लुड़काते हैं ...यादों का सिलसिला अंतहीन है .....

{.... वंदना दुबे ......}
 
कभी कभी
चलते - चलते
यूहीं राह में....

जब भी निगाह पड़ी
गुलों पर छिटकी ओस की बूंदों पर 
या
चमकती सिंदूरी किरणे
सागर की लहरों पर ........
या
दूर एकांत सी सुनसान राहों पर
बस याद तेरी ही आयी
और तेरा ही जिक्र आया ~~


यादें ....

तेरी याद मेरे दिल में
मेरे सासों जैसी
पल - पल साथ ------------
तेरी बातें
सागर की लहरों जैसी
छूकर मेरे पैरों को
रोमांचित कर
लौट - लौट जाती है ...

फूटते हैं
अंतर्मन से
नित
नये - नये
प्रेम के पर्याय
उतारती
उन्हें कोरे पन्नों में
जो
तुम पर अप्रभावी आज भी........

~~~~~
और तुम उतने ही
पाषाणवत रहे
" मनहर "


चहके पंक्षी
महकी वसुधा
किरणों ने बाँह पसारी
नव - पल्ल्वित - पुलकित - हर्षित
चहुँ ओर विपुल आलोक छाया
लो फिर एक नयी श्रृंगारित भोर आयी........:)))

जब भी तनहा मैं होती
दूर क्षितिज को ताकती
कल्पनाओं में जीती
तुमसे गुफ़तगू करती
तो कभी आखें छलछला आती
और वही मौन
पसरा चहुँओर 


एक बार चले आओ~~
जब तुम आओगे
रुत हो जायेगी बासन्ती
फूल पत्ते बन पराग
बिछ जायेंगे पथ में
एक बार चले आओ ~~~~

*****
खिल -खिल जावेंगे
भीगे - भीगे नयन
घुल जाएगा संचित विरह - विराग
नीर लेंगे तुम्हरे
पग पँखार
दूंगी तुम पर सर्वस्व वार
हो जाओगे फिर तुम निहाल
एक बार चले आओ ~~~~

*****

कोमल सुमन हरश्रृंगार क़ी परतें
पग -पग में बिखराऊँगी
नयन नीर के लवण सलिल से
कोमल कर धुलवाऊंगी
संग - संग गायेंगे
" कलावती " का राग आलाप
मन होगा अपना तार - तार
एक बार चले आओ ~~~
 

हे आर्य ..!!!
जब कभी आप
नींद में मुझे
बिना मिले ही
बिना देखे ही
छू जाते हो.........

कपकपा जाती हूँ मैं
अपने हीं चादर में उलझकर .........
ना जाने कितने
सतरंगी सपने
मेरे नयनों में
समा जाते हैं........

मुझे भी पता है
उन सपनों की
कोई मंजिल नहीं है...........

ये रिश्ते ,
पानी में चलने जैसे
पवन में उड़ने जैसे
धरती अम्बर क्षितिज से
दृष्टि गोचर अंतहीन
सागर की लहरों का नाद जैसे

.......

नींद खुलते ही
तुम्हारी छबि विलुप्त
हो जाती है
नयन डबडबा जाते हैं.......

काश !!!
ऐसा हो पाता और
हम दोनों के मध्य होती
मौन अभिव्यक्ति ……

-- © --
वंदना दुबे
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