Wednesday, 20 August 2014

आ गया घनकाल ~~~~
घनघोर
घन - घन करते
घिरे - घनरस
घनन - घनन
टप - टप 
टपाटप
श्रृंगारित हुए पात - पात
भीगा मन मेरा भी ~~~

Saturday, 2 August 2014


इंद्रधनुषी भोर
ताज़गी भरा सवेरा
तेरी यादों ने
लो फिर
डाला है डेरा !!!
अरुण आभा की 
मुस्कराहट
चहुंओर छायी
लो फिर एक
पुलकित प्रफ्फुलित उल्लासित
बिहान आई !!!
 — 
Photo: इंद्रधनुषी भोर 
ताज़गी भरा सवेरा 
तेरी यादों ने
 लो फिर 
डाला है डेरा !!!
अरुण आभा की 
मुस्कराहट 
चहुंओर छायी 
लो फिर एक 
पुलकित प्रफ्फुलित उल्लासित
बिहान आई !!!

" प्रेम " मन को अलंकृत करता है। कनक सी चमक, अलौकिक दिव्यता और मन का आवरण है , प्रेम में रहना या जीना एक शाश्वत अतुल्य आनंद का अनुभव है, यह व्यक्तित्व की शुद्धतम स्थिति, जिसमें संवेदनायें - भावनायें एक दूसरे से जुड़ी रहती है, भावों को समझनेकी परख होनी चाहिये। प्रेम मौन भी हो तो दॄष्टि का सुख और स्पर्श का सुख का अपना अनूठा आनंद है जिसमें दोनों ही आनंदित होते हैं ,~~~~~~~"प्रेम " ईश्वर का दिया उपहार है चिन्तन हैं, मनुहार है , प्रेम को परिभाषित करना या गढ़ना बहुत कठिन है , स्पर्श का सुख ,दृष्टि का सुख , मिलन का सुख और वियोग का सुख सारे रसों से सराबोर है प्रेम। सावन की पहली बूंदों जैसा ~~~~~

प्रेम शब्द जब आचरण से मंडित होता है तो वह जप और मंत्रों की शक्ति प्राप्त कर लेता है ..हमारे विचार ही हमारे शब्द बनते है ... शब्दों से भाव पनपता है भाव ही कर्म और प्रेम की रचना करते हैं ह्रदय के निर्मल मन से जो सुर निकलेंगे वे अतभुत गगनगामी तुल्य होंगे !!!

मुझे तो प्रेम प्रकृति के हर रंग में दिखता है " तुम्हारे प्रेम को पढ़ने की सामर्थ्य मुझमें है , बस तुम मूक रहो प्रशांत सागर से, मेरी शब्द लहरियाँ तरंगों सी, पूनम - अमावस के ज्वार - भाटे सी, क्षण - क्षण तुमसे टकराकर, आंदोलित कर तुम्हें गतिमान करते रहेंगी और तुममें प्रेम को संचारित करते रहेंगी। " ......:))))

===== © वंदना दुबे
 — 
Photo: " प्रेम " मन को अलंकृत करता है। कनक सी चमक, अलौकिक दिव्यता और मन का आवरण है , प्रेम में रहना या जीना एक शाश्वत अतुल्य आनंद का अनुभव है, यह व्यक्तित्व की शुद्धतम स्थिति, जिसमें संवेदनायें - भावनायें एक दूसरे से जुड़ी रहती है, भावों को समझने की परख होनी चाहिये। प्रेम मौन भी हो तो दॄष्टि का सुख और स्पर्श का सुख का अपना अनूठा आनंद है जिसमें दोनों ही आनंदित होते हैं ,~~~~~~~"प्रेम " ईश्वर का दिया उपहार है चिन्तन हैं, मनुहार है , प्रेम को परिभाषित करना या गढ़ना बहुत कठिन है , स्पर्श का सुख ,दृष्टि का सुख , मिलन का सुख और वियोग का सुख सारे रसों से सराबोर है प्रेम। सावन की पहली बूंदों जैसा  ~~~~~

प्रेम शब्द जब आचरण से मंडित होता है तो वह जप और मंत्रों की शक्ति प्राप्त कर लेता है ..हमारे विचार ही हमारे शब्द बनते है ... शब्दों से भाव पनपता है भाव ही कर्म और प्रेम की रचना करते हैं ह्रदय के निर्मल मन से जो सुर निकलेंगे वे अतभुत गगनगामी तुल्य होंगे !!!

 मुझे तो प्रेम प्रकृति के हर रंग में दिखता  है " तुम्हारे प्रेम  को पढ़ने की सामर्थ्य मुझमें है , बस तुम मूक रहो प्रशांत सागर से, मेरी शब्द लहरियाँ तरंगों सी, पूनम - अमावस  के ज्वार - भाटे सी, क्षण - क्षण तुमसे टकराकर, आंदोलित कर तुम्हें गतिमान करते रहेंगी  और तुममें प्रेम को संचारित  करते रहेंगी। "  ......:)))) 

===== © वंदना दुबे

यादों का सिलसिला ~~
बार - बार चला जाता है
क्यूँ ???
बीते कल की ओर
और
बेसाख्ता !!!
इन नयनन में
नमी ,
कुछ ख़ुशी की
कुछ गम की
कुछ आशायें !!!
आने वाले कल की

Continuation of memories ~ ~
Again and again goes
Why???
Yesterday the
And !!!
In these eyes
Humidity,
Some pleasure
Some of sorrow
Some expectations!!
Of tomorrow ~
Vandana ~
 
Photo: यादों का सिलसिला ~~
बार - बार चला जाता है
क्यूँ ???
बीते कल की ओर
और
बेसाख्ता !!!
इन नयनन में 
नमी , 
कुछ ख़ुशी की 
कुछ गम की 
कुछ आशायें !!!
आने वाले कल की 

Continuation of memories ~ ~ 
Again and again goes 
Why??? 
Yesterday the 
And !!! 
In these eyes 
Humidity, 
Some pleasure 
Some of sorrow 
Some expectations!! 
Of tomorrow ~ 
Vandana ~

मेरे मनहर ..!!!
जब कभी आप
नींद में मुझे
बिना मिले ही
बिना देखे ही
छू जाते हो.........

कपकपा जाती हूँ मैं
अपने हीं चादर में उलझकर .........
ना जाने कितने
सतरंगी सपने
मेरे नयनों में
समा जाते हैं........

मुझे भी पता है
उन सपनों की
कोई मंजिल नहीं है...........

ये रिश्ते ,
पानी में चलने जैसे
पवन में उड़ने जैसे
धरती अम्बर क्षितिज से
दृष्टि गोचर अंतहीन
सागर की लहरों का नाद जैसे ~~~~~~

.......

नींद खुलते ही
तुम्हारी छबि विलुप्त
हो जाती है
नयन डबडबा जाते हैं.......

काश !!!
ऐसा हो पाता और
हम दोनों के मध्य होती
मौन अभिव्यक्ति ……

-- © --
वंदना दुबे —
Photo: मेरे मनहर ..!!! 
जब कभी आप 
नींद में मुझे 
बिना मिले ही 
बिना देखे ही 
छू जाते हो.........

कपकपा जाती हूँ मैं
अपने हीं चादर में उलझकर .........
ना जाने कितने 
सतरंगी सपने 
मेरे नयनों में 
समा जाते हैं........

मुझे भी पता है
उन सपनों की
कोई मंजिल नहीं है...........

ये रिश्ते ,
पानी में चलने जैसे 
पवन में उड़ने जैसे 
धरती अम्बर क्षितिज से 
दृष्टि गोचर अंतहीन 
सागर की लहरों का नाद जैसे ~~~~~~

.......

नींद खुलते ही 
तुम्हारी छबि विलुप्त 
हो जाती है 
नयन डबडबा जाते हैं....... 

काश !!!
ऐसा हो पाता और 
हम दोनों के मध्य होती 
मौन अभिव्यक्ति ……

-- © --
वंदना दुबे —

Feeling Depressed ..........   

कानपुर हत्याकांड पर मेरी कलम से -----------

हमारे जन्म - सम्बन्ध या रक्त - सम्बन्ध पीढ़ी दर पीढ़ी होते हैं, उन्हें सहेजना हमारा परम कर्त्तव्य है हमारे आचार, विचार, व्यवहार, संस्कार और धर्म को अगले आने वाले अपने कुल को सम्प्रेषित करना हमारा नैतिक दायित्व है, और हम सब इसका पूरी तन्मयता से निर्वहन भी करते हैं, जैसी नीव हम डालेंगे !!! रिश्तों की जड़ता भी उतनी मजबूत होगी।

इसके विपरीत मित्रता और प्रेम के शाश्वत सम्बन्ध हमारे निर्मित किये होते हैं, जिनमें भावनायें, सम्वेदनायें, आत्मीयता, प्रघाड़ता होती है जो क्षण - क्षण हमें खुशियाँ और शांति प्रदान करती हैं, और सुखद स्वप्नों की सैर कराती है , ये रिश्ते पूर्णतया ऐक्छिक होते हैं, दार्शनिक दृष्टि डालें तो समाज इन रिश्तों के लिये उदात्त कभी भी नही रहा, हमेशा समाज ने जाति, पंथ और आर्थिक स्तर में संबंधों को जकड़ना चाहा।
समाज के इस त्रुटिपूर्ण रवैये से प्रेम की सहजता, निर्मलता, पवित्रता, नैसर्गिता प्रभावित होती है और होती रहेगी। समाज में फैली हुयी सारी विपरीत परिस्थितियां विरोधाभास और गलत व्याख्याओं के कारण ही सामने आ रही हैं, समाज के डर से प्रेम को छिपाना सीमा तोड़ने का डर न जाने कितनी मासूमों की जिंदगियां तबाह कर रहा है। कृपया अपने विचार भी दें !!!!
_/\_

© ~~~ Vandana Dubey
 —
Photo: Feeling Depressed  .......... :( :( :( 

कानपुर हत्याकांड पर मेरी कलम से -----------

हमारे जन्म - सम्बन्ध या रक्त - सम्बन्ध पीढ़ी दर पीढ़ी होते हैं, उन्हें सहेजना हमारा परम कर्त्तव्य है हमारे आचार, विचार, व्यवहार, संस्कार और धर्म को अगले आने वाले अपने कुल को सम्प्रेषित करना हमारा नैतिक दायित्व है, और हम सब इसका पूरी तन्मयता से निर्वहन भी करते हैं, जैसी नीव हम डालेंगे !!! रिश्तों की जड़ता भी उतनी मजबूत होगी। 

इसके विपरीत मित्रता और प्रेम के शाश्वत सम्बन्ध हमारे निर्मित किये होते हैं, जिनमें भावनायें, सम्वेदनायें, आत्मीयता, प्रघाड़ता होती है जो क्षण - क्षण हमें खुशियाँ और शांति प्रदान करती हैं, और सुखद स्वप्नों की सैर कराती है , ये रिश्ते पूर्णतया ऐक्छिक होते हैं, दार्शनिक दृष्टि डालें तो समाज इन रिश्तों के लिये उदात्त कभी भी नही रहा, हमेशा समाज ने जाति, पंथ और आर्थिक स्तर में संबंधों को जकड़ना चाहा।
समाज के इस त्रुटिपूर्ण रवैये से प्रेम की सहजता, निर्मलता, पवित्रता, नैसर्गिता प्रभावित होती है और होती रहेगी। समाज में फैली हुयी सारी विपरीत परिस्थितियां विरोधाभास और गलत व्याख्याओं के कारण ही सामने आ रही हैं, समाज के डर से प्रेम को छिपाना सीमा तोड़ने का डर न जाने कितनी मासूमों की जिंदगियां तबाह कर रहा है। कृपया अपने विचार भी दें !!!!
_/\_

© ~~~ Vandana Dubey

सुबह - सवेरे
स्वच्छंद
साँवरे - सावन
की सर्र - सर्र सरसराती
हवाओं के साथ
जल - बिन्दु 
भिगो गयी मुझे ~~~
कि अचानक
मौसम ने ली
अंगराई !!
सूरज ने इंद्रधनुषी छटा बिखराई
यूँ लगा ~~~
आचमन कर लिया मैंने
तुम्हें धारण कर लिया मैंने
मानों - मौन मधु
सरस हो गया !!!

===== © वंदना दुबे
 —
Photo: सुबह - सवेरे
 स्वच्छंद
साँवरे  - सावन 
की सर्र - सर्र सरसराती 
हवाओं के साथ 
जल - बिन्दु 
भिगो गयी मुझे ~~~
कि  अचानक 
मौसम ने ली 
अंगराई !!
सूरज ने इंद्रधनुषी छटा बिखराई 
यूँ लगा ~~~
आचमन कर लिया मैंने 
तुम्हें धारण  कर लिया मैंने 
मानों - मौन मधु
 सरस हो गया !!!

===== © वंदना दुबे