भोर भये और सांझ ढले नित -दिन आते हो याद मुझे ........ अपनी " यादों " से कह दो हमें न सताया करें तारों की गिनती भी याद है जाग - जाग कर वापस चली जाया करें हरे न चैन मेरे पास न आयें !!
जब शाम ढले तो दिल में आओ जब सितारों की बारात चले तो दिल में आओ बिखरी चान्दिनी में हमें न सताओ ~~
वंदना —
ऊंचाई वो , जहाँ से अपने भी नज़र आयें यादें वो , वो तनहायी में साथ निभाएं अच्छायी वो , जो बिगड़े संबंधों को बनाये और सालों - साल निभाये !!!
............ वंदना दुबे
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Monday, 3 February 2014
अरुणोदय मुझे पसंद है तुम्हारी याद दिलाता है। एकांत मुझे पसंद है तुम्हारे स्वप्न दिखाता है। ये वसुंधरा !!! तो स्वर्ग है इसके हर रूप - रंग में दिल में बसे रहते हो बसे रहोगे युगों - युगों तक ....... :)) वंदना दुबे .....
हमारा जीवन भी फूलों और वृक्षों सदृश्य होता तो कितना सुन्दर होता जो जीवन पर्यन्त खिलखिलाते हुए खुशबू बिखेरते हैं। सघन छाया , सुगंध और निर्मलता बाटते हैं। मुझे पतझड़ बिलकुल पसंद नही जो पत्तों को पेड़ों से अलग करती है , पत्तो की फैली हुयी सघन चादर वनों में देखकर अत्यंत दुःख होता है। आत्मा से आवाज़ निकलती है हे पर्ण ! हे कोमल ! मुझ जैसे जाने कितनो को तुमने अपनी नन्ही सी छाँह दी है। तुम्हारा जीवन सार्थक और स्वर्ग में तुम्हारा स्थान सुरक्षित। पुष्पों की भी निराली दुनिया उन्हें, खिलखिलाते हुए देखने का अपना अलग आनंद। उन्हें उपभोग ( तोडना , गुथना , माला , सेज सजाना ) करने में नही ...... सुगंध की तृष्णा में एक बार फूल तोड़ने पर बारम्बार मन होगा और अपहरण की लालसा प्रबल होगी मेरा बस चले तो चार दिन में मुरझाने वाले पुष्पों को फिर से प्रफुल्लित कर दूँ , नवजीवन दे दूँ , पर तोड़ूं कभी नही।
Vandana Dubey
हे दिवाकर देव !!!
शिशिर निशा काल का अंत गहन गिरि कानन और उपवन में श्यामल गगन को अपने तम और प्रकाश पुंजों से परिष्कृत कर दो हे दिवाकर देव !!!
--------- प्राची के महाद्वार से सवेरे - सवेरे सूर्य का रथ तेज़ी से निकले पवन सहलाये कपोल "प्रियतम " के स्वप्न स्नेह के टूटे तुम्हारी किरणों से सुन्दर सुकुमार देह खोले नयन तुम्हारी आभा से सुदूर सागर किनारे हे दिवाकर देव !!!
----------- समीर तेरे प्रतिकर्षण से मैं तुम्हें छू लूंगी उनकी मध्धम - मध्धम मलयानिल महक का अभिसार कर लूँगी " प्रियतम" को आत्मसात कर लूँगी ! आरम्भ से ही गोचर होकर रहे अगोचर ........
=== वंदना दुबे =
Diwakar O Lord ! ! !
Marks the end of winter season Deep mountain forest And in park Shyamal out the sky From the darkness and the light beams Two sophisticated Diwakar O Lord ! ! !
--------- The gateway to the Orient Morning - morning Chariot of the Sun Morning wind Shlaye Jowl " beloved " in Broken dream of affection Your rays Beautiful delicate body Open Nayan Your Aura Far from the beach Diwakar O Lord ! ! !
----------- Samir your repulsion I 'll touch you His Mddhm - Mddhm Mlyanil smelling There will converge to Sweetheart Will adopt
From the beginning Are tangible and intangible ........