Tuesday, 9 June 2026

लंदन व यूरोप ट्रिप वृत्रांत

 “यू के व लन्दन यात्रा वृतांत”






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हमारी यात्रा लन्दन से शुरू हुयी , लन्दन एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों का मिश्रण है , भव्य महल, लन्दन ऑय, बिगबेन, मैडम दुसाज, जगत प्रसिद्ध संग्रहालय, क्रिकेट ग्राउंड लोड्स, टावर ऑफ़ लंदन ( जहाँ कोहिनूर हीरा मुकुट में जड़ित है )और खूबसूरत इमारतों से सुसज्जित  सड़कों की आभा देखते ही बनती है । 

लन्दन ऑय से शहर  का नज़ारा अतभुत दिखता है |  लन्दन ब्रिज की कलाकृति बेजोड़ है । ४ दिवस हम लन्दन में रहे | 

लन्दन से पेरिस हम यूरो ट्रेन से गए थे, जिसका सफर समुद्र की गहराइयों से तय होता है |  वर्साय पैलेस 17 वी शताब्दी की फ्रांसीसी कला  और महानतम उपलब्धियों के साथ विश्व की अनुपम धरोहरों में सूचीबद्ध  है । एफिल टावर अपनी विशेष तकनीकी और मानव निर्मित ३३० मीटर ऊँची कलाकृति दुनिया के ७ आश्चर्य में से एक है | रातों में उसका चमकता विराट स्वरूप मंत्रमुग्ध कर देता है , लेबल 3 से शहर का नज़ारा अकल्पनीय सा है | 

शहर की चकाचौंध ,रातों की जगमगाहट , seine river में क्रूज़ में घूमना अद्धुत अनुभव रहा मेरे  लिए  | डिजनीलैंड  की  रंगीनियां बच्चों के लिए मनोरंजन का अच्छा साधन है | बेशुमार राइड्स थी, वहां हमने बस कुछ ही का आनंद लिया | रंगीन ड्रेसों  में सुसज्जित बच्चे आकर्षण का केंद्र थे ।


विभिन्न देशों की संस्कृति,रहन-सहन, वेशभूषा , कला, साहित्य, भाषालिपी,  नयनाभिराम अंचल , हिमतुंग शिखर व आकाश की इन्द्रधनुषी छटा बरबस मन मोह लेती है।

|यात्राएं जीवंत किताबेँ होती हैं जो आजीवन खुशियां देती हैं | यात्राओं से आप निडर, अनजान जगहों पर घूमने का साहस और चुनौतिया आपके दिल और स्वास्थ्य के लिए वरदान साबित होती हैं ।

यूरोप और लन्दन की AQI  भी बहुत उन्दा है जिसे हम पैदल चलने पर महसूस कर पाते हैं । डेली लगभग हमारे 8000 -10000 steps हो जाते थे, नींद भी बढ़िया आती थी ।


पेरिस से हम बेल्जियम गये  Brussels की प्राचीन भव्य इमारतें चकित कर देती हैं |  grand place central sqare brussels की अपारता  युवाओं का बेंड और मधुर music आपको वहां से हिलने नही देता | चारों दिशाओं की इमारतों की अभूतपूर्व  कलाकृति  मन को आंदोलित  करती है | brussels City musium भी बेहद आकर्षक है यहां की बेल्जियम चॉकलेट भी बडी  स्वादिष्ट होती है | हमारे क्रिकेटर  विराट कोहली भी Evian का natural स्प्रिंग वाटर पीते हैं |  


एम्स्ट्राडेम में नौकायन मनोरम इमारते और काफ़ी का स्वाद अभी भी याद आता है । एक जादुई एहसास यहाँ आप महसूस करोगे। साइकिल राइडिंग के लिए अलग से सड़क है जो बहुत लुभावनी प्रतीत होती है ।

“यादें जश्न हैं ज़िंदगी का 

लिखती है गीत कोई ख़ुशी का “


डैम स्क्वायर की रौनक और चकाचौंध मंत्रमुग्ध करती हैं। वैभवता हर ओर परिलक्षित होती है ।

यहाँ से हम स्विट्ज़रलैंड पहुंचे  मैं २ बरस पहले भी यहां आ चुकी हूँ । स्विजरलैंड के साथ  बुडापेस्ट, ऑस्ट्रिया, प्राग   देखा था  “  Switzerland 

Is a  breathtaking masterpiece of Nature " 

यश चोपड़ा ने "DDLJ"  में यहॉँ  की खूबसूरती  और  प्राकृतिक दृश्यों को बहुत खूबसूरती से 

परोसा  हैं | यहाँ उनका बड़ा सम्मान है | Lusern में उनका स्टेचू और 

कई जगहों पर फिल्म के पोस्टर लगे हुए हैं ( Saanen , Gstaad , Interlaken , MT Titlis, Junjfrau ) 

सभी खूबसूरत वादियों को हमने आँखों  में समेटा |  हम Lausanne ,Interlekin , Engelberg  Zurich में रुके थे | यहां की ट्रेन भी बहुत आनंद प्रदायनी  होती है | Alps , शानदार घड़ियाँ , lind chocolates ,हिम श्रंखलाएं , छोटे छोटे  हरे भरे गाँव , गायें, स्वच्छ  आवोहवा सफाई आश्चर्यचकित  करती है  मन करता है यहीं बस जाएँ ।

,  "सौंदर्य मौन दृष्टिगत  होता है बहुत आहिस्ता से कानों में रास घोलता है हमारी नज़रे ही उन्हें देख पढ़ और आत्मसात करती है"।

 विश्व का सबसे महँगा देश अपनी सुंदरता   और मज़बूत इकोनॉमी के लिए जाना जाता है | यात्राओं से हमें स्थान के साथ साथ आत्मीयता व्यक्तिकता , कल्पनाशीलता और रोचकता का ज्ञान होता है,जिससे हमारा जीवन के प्रति दृष्टिकोण भी बदलता है  | 


आगे हम जर्मनी की ओर गये , फ्रैंकफर्ट में रुके  वहाँ की आधुनिक गगनचुम्बी इमारतों और समृद्धता का अतुलित संगम है मैन नदी , कोलोन कैथेड्रल , और लकड़ी के सुन्दर घर मन मोह लेते हैं | कोलन कैथेड्रल ६०० वर्षों में निर्मित हुआ था , जो Would UNESCO Heritage Sites साइड है , जर्मनी में गगन की छटा निराली है | Rhine Valley से बोटिंग करने पर पहाड़ों का नैसर्गिक सौंदर्य अनुपम होता है ।

राइन घाटी किसी काल्पनिक दुनिया से कम नहीं   राहिन नदी से सीढ़ीदार अंगूर के बागीचे , महलों के खूबसूरत नज़ारे , और नीलगगन अतभुत दृष्टिगत होता है | 


Liechtensteinमध्य यूरोप में स्विट्जरलैंड और ऑस्ट्रिया के बीच स्थित है । यह दुनिया के उन कुछ देशों में से एक है जहाँ अभी भी राजतंत्र (Monarchy) है。 यहाँ के प्रमुख (प्रिंस) है । अपने अल्पाइन पहाड़ों, हरी-भरी घाटियों और मध्ययुगीन किलों के कारण यह एक बहुत ही खूबसूरत पर्यटन स्थल  है प्रमुख आकर्षणों में Vaduz Castle शामिल है ।


इसके बाद हम ऑस्ट्रिया पहुंचे , Vienna विश्र्व में सबसे शुद्ध पानी के लिए जाना जाता है | वहां हमने Swarovski  Crystal Museum देखा जिसे "चैम्बर ऑफ़ वंडर्स" भी कहा जाता है |Swaroski  Jwellery की असंख्य अनुपम बेजोड़ डिज़ाइन देखी | 


अगला पड़ाव हमारा इटली था | विश्व के सबसे ज्यादा पर्यटकों की पसंदीदा जगह  अपने समृद्ध इतिहास , प्राचीन वास्तु कला , सुंदरता वेनिश की गोंडोला,  नौकायन,सबकुछ बहुत ही खूसूरत था UNESCO World Heritage  Sites में लिस्टेड है ।

पहले हमने Florence देखा समद्धशाली बेजोड़  शिल्प और वास्तुकला , विशाल और अद्वितीय रंगीन  अष्टकोणीय गुंबद और संग्रहालय देखे | 

दुनिया की ६०% कलाकृतियां इटली में है ऎसी मान्यता है | ऊपर देखने पर वहां की सुंदरता और  कृतियाँ  चकित कर देती हैं | यहाँ का पास्ता और पिज़ा का स्वाद भी निराला था | 

दुसरे दिन हमने पीसा , कोलोसियम और नगर भ्रमण  किया ।

लन्दन और पेरिस  की तुलना में इटली का मार्किट सस्ता था ।

कोलोसियम का निर्माण ७०-७२ ईस्वी में किया था ५०००० से ८०००० लोंगो के बैठने की क्षमता थी दुनिया के आश्चर्य  में से ये भी एक है | इटली  अर्वाचीन काल से वास्तुकला की नगरी है | पीसा का तिरछे स्वरूप हमें वाराणसी के एक तिरछे मंदिर जो गंगा किनारे स्थित है उसकी याद दिलाता है । 


तीसरे दिन हम Vatican City गए विश्व का सबसे छोटा कंट्री जहाँ की जनसंख्या 900 मात्र ।

विश्व का रोमन कैथोलिक का सबसे बड़ा चर्च और दुनिया के सबसे बड़े पॉप का निवास स्थान | बहुत ही खूबसूरत संरचना , पुराणी चित्रकलाएं  UNESCO World Heritage Sites पर दर्ज है यहाँ माइकल आंजेलो जैसी महान हस्तियों की उत्कृष्ट कृतियाँ उपलब्ध हैं ईशा मसीह को जिस सूली पर लटकाया था उसे अवशेष अंदर 

सुरक्षित हैं । 

पॉप की देह भी दर्शन हेतु राखी गयी है कॉपर स्तम्भ अनुपम वास्तुकला से निर्मित प्रतीत होते हैं ईसाई धर्म के लिए यह परम- पवित्र स्थल है | क़ुदरत की गोद में बेशुमार ख़ज़ाना है, जो हमें ढूढ़ना होता है, 


सुंदरता का हर स्रोत प्रकृति से शुरू होता है। ख़ुशबू का एहसास, झरनों का कलकल, पर्वतों का अलौकिक सौंदर्य पाख़ियों का कलरव, फलों की मिठास सब मन में निर्मल भाव उत्पन्न करते हैं, मन को शांति मिलती है । फूलों के साथ प्रकृति हँसती है ।जब हम किसी देश की यात्रा करते हैं, उससे जो अहसास होता है, वह अनुभव के रस में डूबा होता है।पढ़ने या टीवी में देखने से उस जगह की भाव कम होता है । एकांत होने पर छायाचित्र की तरह मन में संचालित होते हैं और ख़ुशियाँ देते हैं ।


इस लेख को लिखने के लिए पापा ने मुझे प्रोत्साहित किया है । अपना अनुभव शेयर किया है आप सबसे ।

धन्यवाद——- 🙏 ——


~~ वंदना दुबे ~~

Sunday, 16 May 2021

 



चैत की दोपहरी

में बह रही
इन दिनों
निर्बाध हवायेँ ----
तपिश भरे दिनों में
चिलचिलाती पवन संग
फिर मुस्काई
आँगन में,
गुलमोहर कलियाँ
दूर तक फैला सिन्दूरी बिछौना
स्वप्निल सा आभास
निहारे अपलक नयन -----

वसुधा के रंग अनेक

 वसुधा के रंग  अनेक 




~~~~ 

वैशाख  की तपिश में 

पीत हुए पात - पल्लव 

बड़े दिवस  हुये

सिकुड़ गयीं निशायें ----

~~~~ 

कुहू-कुहू कोयलिया  करती 

इठलाती फिरती अमुआ 

की डाल - डाल  पर 

मालती  के पुष्प-गुच्छ 

सुंदरता देते  और देते  झुकने का सन्देश ------ 

~~~~ 

तारुण्य आया 

अमलतास (स्वर्णपुष्पी ) पर 

मादक हुआ वन - उपवन 

कोरोना -काल में 

सिंदूरी परिधान में 

गुल मोहर भी मुस्काया -----

~~~~ 

लगने- लगा मुझे 

जलती उमस भरी गरमी में 

कोई ठंडी हवा का झोंका  

नन्ही सावन की बूंदों सा 

टपका माथे पर,

भीगा मन मेरा भी 

देख "वसुधा के रंग अनेक"  ~~~ 

Wednesday, 20 May 2020

लाकडाउन -४ 

डर के आगे जीत है , विगत ६० दिनों से हम सब एकाकी जीवन जी रहे हैं , इस दौर में विचलित होना स्वाभाविक है |  धैर्य , दूरदर्शिता , साहस  से आने वाली हर चुनौती का सामना करना होगा हमें ----  समग्रता , संतुलन, सहजता और करुणा की पराकाष्ठा से बड़ी से बड़ी महामारी ( कोविड -१९ ) से हम एकजुट हो दूर रहकर सामना कर लेंगे |
                                                    जीवन असंख्य  संभावनाओं और प्रेरणाओं  की खदान है ,इन दिनों  हमारी आत्मा में सकारात्मकता  , आत्मसंयम,  अनुशासन , मननशीलता और आध्यात्म का जो बीज रोपित  हुआ है यूँ लगता है मानों दो माह का कोई देवीय अनुष्ठान किया हो हमने ----   इन अनुभवों को संजो हमें आजीवन जीना है ---  विषम समयाविधि में हमने खूब आत्ममंथन और आत्मचिंतन किया है ,  धनात्मक सोच और सात्विकता को अंगीकार कर हमने एक आनंददायी जीवन जिया है |

मन  जब दुखी होता है तो दोनों  (+ - )  तरह के विचार हमें व्यथित करते हैं , दिन लम्बे और लम्बे लगते हैं वैसे भी जेठ ऋतु में रातें छोटी होती हैं , ये समय अस्थायी है हताशा छोड़  हौसला रख संकल्पित होना होगा | परीक्षा की घड़ी सा ये काल बिताना होगा हंसकर तभी हम अपने मन में को "कोरोना"  से लड़ने लायक बना पाएंगे |

वसुधा संवर रही है इन दिनों हम देख रहे हैं , इस भीषण गर्मी में अमलतास की झालरें और गुलमोहर के सुर्ख आच्छादित  तरुओं से हमें प्रेरित होना चाहिए , हमेशा रंगों और    उल्लास से भरे-भरे से दृष्टिगत होते हैं , अवनि  और अम्बर की अठखेलियां प्रत्युषा से सांयकाल तक विविध इंद्रधनुषी छटा बिखेरती है , पाखियों  की कतारे, कोलाहल , कृन्दन  इन संग ये आनंददायी  क्षणों  को आत्मसात कर हमारी वेदना कम हो सकती है | प्रकृति प्राचीन काल से ही सहायक रही है हमारा मनोबल बढ़ाने में बस उसके सुरों , रंगो और अतर  को पहचानना होगा, अरण्य संस्कृति और भारतीयता अपनाने की पुरज़ोर प्रयत्न करना होगा हमें विषाद से बचने के लिए |

 हमें स्वयं को आत्मक्रेंद्रित करने , उष्मा , उत्साह,  आध्यात्म और  पठन के लिए सबसे अनुकूल समय है इन दिनों ---- अभी भरी हुयी ये संचित ऊर्जा विपरीत परिस्थितियों में सम्बल प्रदान करेगी और हमें आरोग्यता , सात्विकता और एक ओज से हमारे मानसपटल को देदीप्यमान करेगी | सारा ब्रम्हांड " कोविद १९ " की संजीवनी ढूढ़ने में तत्पर है , सफलता  अवश्य मिलेगी , एक नयी सुबह के इंतज़ार में हैं हम सब जो निश्चित ही आएगी | डर आगे जीत है ---- जीतेंगें हम ----- |||----

Sunday, 3 May 2020



लॉकडाउन
चहके पंछी
महकी वसुधा
अनुपम विस्तृत -व्योम
लॉकडाउन में !
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निर्मल पुण्यसलिला
झरते रजत - निर्झर
स्वच्छ पथ
अलौकिक सागर
पुलकित कानन
लॉकडाउन में !
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रिश्तों का आभास
व्यंजनों की मिठास
गहरी तन्मयता
बालहठ
केरम - पत्तों- लूडो के
हास- परिहास
रामायण - महाभारत
इस लॉकडाउन में !

Lockdown Pictures | Download Free Images on Unsplashजिंदगी न होगी पहले सी कभी -----

न जाने मुझे क्यूँ
यक़ीन  हो चला है ,
जिंदगी न होगी पहले सी कभी -----
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वो मेले के झूले
ब्याह की  सजावटें
सांध्य संगीत सभाएं
मित्रों के कहकहे !
जिंदगी न होगी पहले सी कभी -----

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मंदिरों की कतारें
करतल ध्वनियों की अनुगूंज
संतो का सानिध्य !
पावों की थिरकन
जिंदगी न होगी पहले सी कभी -----


कुदरत की साज़िशें
मंदिर बंद मदिरालय खुले
जीविका की क्षति
जीवन संघर्ष ख़त्म
एक अज्ञात भय
गुमसुम मन
काल की अनंत पगडण्डी पर
अविराम जीवन क्रिया
 जिंदगी न होगी पहले सी कभी -----


Thursday, 12 March 2020

 पाषाण का दुःख “
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युगों-युगों से
 तप-तप कर 
आंधी -पानी -तूफ़ान 
सह-सह कर 
लोगों का प्यार न पाया 
पाषाण ही कहलाया -------

कभी विभ्राट गिरि 
उत्तुंग हिमशिखर 
कभी विंध्याचल का 
अपलक दर्शन 
नदियों का तात होकर भी 
लोगों का प्यार न पाया 
पाषाण ही कहलाया -------

सरिता तट पर 
शिला बना 
लोगों ने  शीश नवाया 
कभी 
बहुरंगी रत्न बन 
बहुतों का भाग्य जगाया 
आत्मरत्न न बन पाया 
छू -छू  सबने  बहुत सराहा 
पर 
उपमा पाषाणवत की ही मिली 
लोगों का प्यार न पाया ——

रेत बना बिखरा 
और बिखरता चला गया 
नन्हों से हाथों से 
बस 
फिसलता चला,
पाषाण ही कहलाया ------

~~ वंदना दुबे ~~
--


मैं बसंती पवन  हूँ !


मैं बसंती पवन  हूँ, 
जाती ठण्ड की 
कुनकुनी धूप  लिए 
फिरूं मैं 
इधर- उधर 
बड़ी मनचली सी---- 
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पीत वसुधा 
पीत कुसुम 
तरुण आम्र की मंजरियाँ 
को करती शोभित 
खिली चमचमाती सब 
मैं बसंती पवन   हूँ -----

कोमल -मधुर हास -विलास 
"बसंत" का आलाप करती 
नव -तरंग छुई -मुई सी 
चपल मैं 
पुलकित करती  सृष्टि 
मैं बसंती पवन  हूँ ------

~वंदना दुबे ~
--

Friday, 26 July 2019




फिर सावन का आगमन
श्यामल-श्यामल हुआ गगन
घनरस की धुन गुन-गुन ------

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बूंदों की अपनी शैली
अलबेली सी
अपना राग
अपना आलाप
कभी विलम्बित
मध्य
तो कभी द्रुत लय सा --------

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ऋतुराग मेघ का
छेड़े मन के तार
कहीं अतिवेग
तो रुनझुन भी
लहरों ने पायल खनकायी
सृष्टि शिल्पित हुयी
सजीले सावन में
सावन का आगमन
प्रिय से होगा  मिलन -------

वन्दना  दुबे 

Saturday, 1 June 2019


                                                           -----मुझे मत जलाओ ----

मुझे मत जलाओ ------
मैं जल रही हूँ
विरहाग्नि में
प्रियतम के अकूत प्रेम में
बुला सको तो उन्हें बुलाओ
मुझे मत जलाओ ------

मानवी प्रीति  की अंतिम अभिव्यक्ति
"तुम"
तुम संग मैंने नापा
गगन के व्यास को
आकांक्षाओं के केंद्र तुम
आओ आओ !
स्नेह वर्षा से   भिगो जाओ
मुझे शांत कर जाओ
मुझे मत जलाओ  ------

Monday, 13 May 2019

जब कभी सांझ ढले मैं छत पर जाती हूँ----एक और सूरज अपनी स्निग्ध हँसती धूप से विदा ले रहे होते हैं , तो आदित्य के अनुपम सौंदर्य पर दृष्टि अटक जाती है और मैं अपलक निहारती रह जाती हूँ |    तो दूसरी और आजकल प्रायः तरु भी बांह पसारे तेज़ पवन की अगवानी करते से प्रतीत होते हैं , पाखियों की कतारें गगन संजोती हैं --------    तो कभी रुनझुन सी बारिस की कुछ बूंदे वातावरण को सुरभित कर जाती हैं -----------  पीछे पलट कर देखो तो मयंक की मध्यम सी छवि दृष्टिगत होती है , इस भीषण गर्मी में भी वसुधा के रूप निराले------      मन दूर कहीं दूर चला जाता है तुम संग किये अनवरत -अविरल संवादों की और -------- सच है ना !!! " स्मृतियाँ भी मेहमान की तरह बेपरवाह होती हैं जब चाहे मन के द्वार खटखटाये चली जाती है"  और हम हतप्रद से,  घंटो बीत जाते हैं पता ही नही चलता |  कभी -कभी यूँ लगता है हमारे सारे कार्यों और क्रियाकलापों को सूर्यदेव ही नियंत्रित करते हैं और हम उन्ही के सहारे सारा जीवन जीते हैं तभी तो हम सभी आदित्य उपासक ! एक ही साक्षात ईश्वर जो दीखते हैं  और हम सबको संचालित करते हैं ….|

Monday, 22 April 2019

"लेटर बॉक्स"


आजकल नहीं
दीखते
लाल-लाल "लेटर बॉक्स"
जो
बंद रखते थे
अपने अंदर,
असंख्य सतरंगी लिफाफों को -------
जिनके अंदर
होती थी, कुछ गुलाबों की पंखुरियाँ
भीनी सुगंध
बोलते शब्द
और कभी
अश्रु -जल चिन्ह
जो हमें यादों की सैर कराते थे -------
जिन्हें संजों रखते थे
हम सूटकेस के
जेबों में
या किसी किताब
के आँचल में
जब भी पढ़ते लवणजल
छलछलाते थे ,
आज भी बीते चलचित्र से
अपना अहसास करा जाते हैं --------
आज व्हॉट्स- अप सन्देश
जो अगले दिन डिलीट -------
ना भाव न अपनापन
बस कॉपी -पेस्ट --------

Friday, 29 March 2019

“नदी के घर”
नदी के घर नहीं होते
धाराप्रवाह -धरा की धमनियों सी
चिरकाल से
उछलती -कूदती ( नर्मदा )
बहती चली आ रही ------
हर बिहान
शीतलता बिखेरती
कल-कल ध्वनि से
नई हो जाती हैं -----
कितने नगर बसाये
घाट बनाये
पार कराये
कभी ना ठहरी
न थकी
बस चलती रही
कभी पुण्यसलिला
सदानीरा
आनंददायनी
मोक्षप्रदायनी
कहलायी-----
जन-जन की
डुबकियां
आकांक्षायें
पूरी करती रही
अविरल-अनवरत
बहती रही
बहती रही
कोई घर नहीं कोई ठिकाना नहीं
नदी के घर नहीं होते ------
~~वंदना दुबे~~

Tuesday, 26 June 2018

चलो मनहर चलो !!!
गहन वन में ,
गगन- आँगन में 
तरुवर की छाया में
पलाश के बिछौने में 
चलो मनहर चलो--- !!!
***
देवदार के कुंजो में ,
हिमतुंग शिखरों में
शीतल कटीली हवाओं में
उबड़-खाबड़ पगडण्डी में ,
चलो मनहर चलो---- !!!
***
पथरीली नदियाँ निहारेंगे ,
तुम संग,
झूमेंगे इठलायेंगे पार करेंगे,
फिर
हिमजल तुम पर बरसाएंगे
चलो मनहर चलो---- !!!
***
देखो !!!
प्रकृति प्रबुद्ध होने लगी ,
वनस्पतियाँ अंगराई लेने लगी
बिखराया प्रफुल्ल सुमन
चहुंओर -----
मानो नव-परिधान पहने धरा
***
इस रिमझिम सांझ की बेला में ,
अलसाये से तरु भी भीगे
रक्ताभ आभा लिये नव- पल्लव
हर्षित -पुलकित
अलंकृत हुआ समूचा अरण्य
नयन दर्शन को आतुर
चलो मनहर चलो---- !!!

Saturday, 2 June 2018

सावन आया खुशियां लाया 

हवाओं में सोंधी महक
वसुधा की  कोमल नमी
अमुआ के झूले
बरखा की मीठी फुहार
छेड़े मन के तार
भीगा  मन मेरा भी~~~~


टप -टप
टपाटप,
सघन मेघ
घिर - घिर
कारे -कारे  ~~~~~
मधुर - मधुर
मिया मल्ल्हार की तानों सा
श्रृंगारित हुए पात - पल्लव
वनस्पतियाँ अंगराई लेने लगी
भीगा मन मेरा भी  ~~~~~

सावन प्रकृति के उल्लास का मौसम है. वैसे तो हम ऋतुराज " बसंत"   को कहते हैं, पर मेरी नज़र में सावन भी कुछ कम नहीं | जीवन दायनी सा , काले मेघ नयनाभिराम दृश्य " सावन के झूले हम कैसे भूले" मेंहंदी से रचे हाथ, नव दुल्हनिया मायके की राह देखती....... सावन आते ही रोम-रोम रोमांचित सा हो जाता है, मन गुनगुनाने लगता है सराबोर घनरस से धरा का कोना -कोना दृष्टिगत प्रतीत होता है मानो प्रकृति ने नए परिधान धारण कर लिए हों और नव-अंकुरण को तत्पर-तैयार |

घन घनन घनन
घिर-घिर
घनकाल ( सावन) की घनघोर
रुत आयी .......


हरी भरी है वसुधा
खगों का है मेला,
फिर भी है दिल अकेला
फिर भी है दिल अकेला

सावन प्रेम को जन्म देता है प्रकृति के साथ मिलकर प्रेम -मास भी कहें तो अतिसंयोक्ति नहीं होगी किसी  के साथ बिठाये खूबसूरत लम्हे....... हमें बीते कल की याद दिलाते हैं | मन बरबस भीग जाता है अश्रुओं  से |

तेरी बातें भी सावन जैसी होती हैं,
मुझे अंतर्मन तक भिगो देती हैं

सावन भगवान शिव का महीना भी कहलाता है .. कुदरत की खूबसूरती को बढ़ाने वाला महीना... सावन का ये सुखद   माह परम ब्रह्म शिव का परमप्रिय  महीना भी है... और इसीलिए सावन में शिव की पूजा का विशेष महत्व है... धार्मिक मान्यताओं के अनुसार  सावन में शिव की साधना से मानव  को कई तरह के लौकिक-अलौकिक फलों की प्राप्ति होती है... और कल्याणकारी शिव सावन में अपने उपासकों का हर तरह से कल्याण करते हैं... भगवान शिव शीघ्र  प्रसन्न होने वाले महादेव हैं,  कहा भी गया है शास्त्रों में उनके बारे में ...
"आशुतोष तुम औघड़ दानी"

इस माह में भगवान शिव के 'रुद्राभिषेक' का विशेष महत्त्व है। इसलिए इस माह में, खासतौर पर सोमवार के दिन  'रुद्राभिषेक' करने से शिव भगवान की कृपा प्राप्त की जा सकती है। अभिषेक कराने के बाद बेलपत्र, शमीपत्र, कुशा तथा दूब आदि से शिवजी को प्रसन्न करते हैं और अंत में भांग, धतूरा तथा श्रीफल भोलेनाथ को भोग के रूप में समर्पित किया जाता है।


सावन का महीना और चारों और हरियाली खुशहाली भारतीय वातावरण में इससे अच्छा कोई और मौसम नहीं बताया गया है। जुलाई- अगस्त में आने वाले इस मौसम में, ना  अधिक गर्मी होती है और ना ही बहुत ज्यादा सर्दी।  वातावरण को अगर एक बार हम अलग भी कर लें,   किन्तु अपने आध्यात्मिक पहलू के कारण सावन के महीने का हिन्दू धर्म में विशेष महत्त्व बताया गया है। सावन के अंतिम दिन हर वर्ष रक्षा बंधन भाई -बहन के अटूट प्रेम का पर्व है |


सावन माह के बारे में एक पौराणिक कथा है कि- "जब सनत कुमारों ने भगवान शिव से सावन महीना प्रिय होने का कारण पूछा तो भगवान भोलेनाथ ने बताया कि “जब देवी सती ने अपने पिता दक्ष के घर में योगशक्ति से शरीर त्याग किया था, उससे पहले देवी सती ने महादेव को हर जन्म में पति के रूप में पाने का प्रण किया था। अपने दूसरे जन्म में देवी सती ने पार्वती के नाम से हिमाचल और रानी मैना के घर में पुत्री के रूप में जन्म लिया। पार्वती ने युवावस्था के सावन महीने में निराहार रह कर कठोर व्रत किया और शिव को प्रसन्न कर उनसे विवाह किया, जिसके बाद ही महादेव के लिए यह विशेष हो गया”।

वैसे सावन की महत्व  को दर्शाने के लिए और भी अन्य कई कहानी बताई गयी हैं जैसे कि मरकंडू ऋषि के पुत्र मारकण्डेय ने लंबी आयु के लिए सावन माह में ही घोर तप कर शिव की कृपा प्राप्त की थी।

कुछ कथाओं में वर्णन आता है कि इसी सावन महीने में समुद्र मंथन किया गया था। मंथन के बाद जो विष निकला, उसे भगवान शंकर ने पीकर सृष्टि की रक्षा की थी।

किन्तु कहानी चाहे जो भी हो, बस सावन महीना पूरी तरह से भगवान शिव जी की आराधना का महीना माना जाता है। यदि एक व्यक्ति पूरे विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा करता है, तो यह सभी प्रकार के दुखों और चिंताओं से मुक्ति प्राप्त करता है।सावन के महीने में भक्त, गंगा नदी से पवित्र जल या अन्य नदियों के जल को कामड़ में कन्धों पर रख  मीलों की दूरी तय करके लाते हैं और भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। कलयुग में यह भी एक प्रकार की तपस्या और बलिदान ही है, जिसके द्वारा देवो के देव महादेव आशुतोष  को प्रसन्न करने का प्रयास किया जाता है।

Wednesday, 15 November 2017



"सपने"
उनींदी चक्षुओं 
के स्वप्न, 
अलौकिक-आलोक प्रभात का,
कल -कल पावस अमृत धारा 
भागीरथी की 
नर्तन करती प्रभाकर की किरणों संग 
भैरव की मधुर तान 
तुम संग मौन अभिव्यक्ति
फिर जगा गयी मुझे 
आखें खुली तो 
बस स्वप्न था......... बस स्वप्न था ....... यथार्थ दूर बहुत दूर था ...........
"सपने" हज़ारों साल से कौतूहल बने हुए हैं .... हज़ारों साल से इनपर शोध हो रहा है, पर पहेली 
उतनी ही गूढ़ रहस्य और उलझी गुत्थी बनी हुयी है ....... आज भी विज्ञान-विधा के लिए, उतनी ही अनबूझ पहेली। बंद नयनों के पीछे कई स्वप्न उभरते हैं| 
"नयन खुले तो स्वप्न अधूरा"
स्वप्न का रिश्ता भूत, भविष्य और वर्तमान सभी से सामान होता है, जैसी सोच होती है, सपने भी उन्ही को साकार करते हैं, रंग बिरंगे मधुर सपने, गुलों पर ओस की बूंदों से नाजुक,सुमन से महकते, विरह में तड़फते , जीवन के हर रस से रचे ~ रंगारंग !!
जिन ख़्वाबों का हम सचेतन अवस्था में गला घोट देते हैं, उन ख़्वाबों को हम सुप्तावस्था में सच होता पाते हैं। हमारे पुराणों में भी विदित है कि केवल मानव जाति ही स्वप्न का आनंद उठा पाती है। स्वप्न में अपने आराध्य/ प्रियतम/ स्नेही जन के दर्शन से मन पुलकित हो उठता है। कभी हम काम के बोझ से थके हों तो सुहाने सपने मन को आत्म-विभोर कर देते हैं........... हर सपना कुछ कहता है, स्वप्न के सार को समझना गूढ़ कला है।
हर स्वप्न कुछ-न कुछ कहता है। कुछ सपने जीवन में खुशियों की लहर भर देते हैं। तो कुछ उदास कर देते है हमें! 
सपनों का सीधा संबंध अंतर्मन से होता है। माननीय अब्दुल कलाम ने भी कहा है
" सपने वही जो आपको सोने न दें "
बहुत से लोंगों का सपना अमीर/ खिलाड़ी / गायक / वादक या बड़े ओहदे पर कार्य करने का होता है, सबके सपने अलग-अलग,......... माँ- बाप को भी बच्चों को स्वयं निर्णय लेने देना चाहिए , हाँ हानि - लाभ आप समझा सकते हैं क्योकि आपने जीवन जिया है अनुभव बाँट सकते हैं पर उनकी रूचि आहत न हो ,अपने मन के काम से बच्चे अपने काम के प्रति अति-उत्साही होंगें ऊंचा मुकाम हासिल करेंगे |
,हमेशा मन की आवाज़ सुने अपने पसंद का काम करें स्वयं हमें तय करना है स्वप्न को हकीकत का रूप देने के लिए प्रत्नशील होना होगा अपने सपने को अपना जूनून बनाना ही सफलता का रास्ता दिखाता है अपने स्वयं के सपने साकार करें, नहीं तो कोई और अपने सपनों को साकार करने के लिए आपको काम पर रख लेगा |
सपना पूरा करने के लिए आत्मविश्वास स्वयं में पैदा करें और उसे जीवंत रूप देने के लिए अंतिम समय तक जूझते रहे सफलता निश्चित आपको शिखर तक पहुंचाएगी |
जब हम नींद में होते है, तब हमारी देह अंतर मन से अलग होती है क्योंकि आत्मा कभी सोती नहीं। जब मानव शयनावस्था में होता है तो उसकी पाँचों ज्ञानेंद्रियाँ उसका मन सुप्तावस्था में तल्लीन और व्यक्ति का मस्तिष्क पूरी तरह शांत रहता है।सपने हमारे दिमाग में चल रही तस्वीरों, भावनाओं और विचारों से बनते हैं...... सपने हमारे अवचेतन मन की उपज होते हैं, इसलिए उन्हें समझना बहुत जटिल होता है. कई सपने हमें कुछ संकेत भी देते हैं. यह संकेत आपके अतीत या भविष्य से भी जुड़े हो सकते हैं. दिमाग की गहराइयों में छुपे भाव और डर भी सपनों का रूप ले लेते हैं. यह हमें मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के बारे में भी बहुत कुछ बताते हैं|
सपने तो सपने 
कब कहाँ अपने 
आँख खुली तो गायब 
और 
रीते हम.......
उस अवस्था में व्यक्ति को एक अनुभव होता है, जो उसके जीवन से संबंधित होता है। उसी अनुभव को स्वप्न कहा जाता है। स्वप्न के सम्बन्ध में कई भ्रांतियाँ भी है जिन्हें हम शुभ- अशुभ का सूचक मानते हैं।
१) सपने में खिले हुए गुलाब के फूल देखने से मनोकामना पूर्ण होती है।
२) पतंग उड़ाना -व्यापार में लाभ।
३) सपने में रसभरे फल खाना अत्यंत शुभ माना गया है।
४) मक्खन - यह प्रसन्नता का सूचक है।
सपनों को ऊंचाई दो, नभ की विशालता दो, अचेतन मन कि मीठी फुहार है, कोई सीमा नही, कोई बंधन नही...... सपनों के संग हम आज़ाद होते हैं.......... उड़ सकते हैं ~~~ चहक सकते हैं **** ख़्वाबों में जी सकते हैं, गहन वन में घूम सकते हैं--------- खुश रहिये, पुलकित रहिये और खूब सपने देखिये। मैं दुआ करूंगी की सबके सवप्न यथार्थ में रूपांतरित हो /\
वंदना दुबे

Thursday, 28 September 2017

चल चले जहां!
प्राची में उदयोन्मुख
किरणें
व्योम-लालिमा, 
जलनिधि को आलोकित करती
जलराशि में नर्तन करती
निहारे संग-संग पाँव जल में डाल
शांत जल को बिखरायेंगे ..... !
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चल चले जहां!
मलय तरु सुगंध
पवन में विलय
हो जाती हो......
क्षण -क्षण जन-जन को
आनंदित कर जाती हो .... !
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हिमाच्छादित पर्वत मालाएँ,
भीमपलासी की तानों संग
जहां देवदार बातें करते हैं
वसुधा से.....
बांह पसारे अनगिन झोके
चकित नयन
चल चले वहां ........!
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"गोमुख " की पावन
धारा में
हिम-शिखरों से श्रृंगारित
भू हो
भागरथी का
निर्मल-कलकल.... छलछल-अविरल जल
अरण्य को नित जलपान कराय रे..... !
चल चले वहां
बस मन वहीं रम जाए रे ....!!!
~~ वंदना दुबे ~~

Thursday, 1 June 2017

हंसीं में छुपी जीवन की ख़ुशी “ ===================
" छोटी सी हँसी
बड़ी है ख़ुशी
हर गम की दवा
जिसके आगे न कोई टिका..."
ख़ुशी में छिपा है जीवन का " निर्मल आनंद" अनंत समस्याओं का निदान और समाधान .......मुस्कराहट से ...........मुस्कराहट हमें सहजता, सरलता, सुंदरता और आत्मविश्वास से भर देती है, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, तनाव और भी अनेक रोगों को दूर भगाने के लिए हँसी राम बाण औषधि है, तनाव, चिंता, डर, गुस्सा, अधीरता आदि नकारात्मक प्रवृतियों से हमारी चयापचय क्रिया प्रभावित होती है , अन्तःस्त्रावी ग्रंथियां ठीक से काम नही कर पाती है | क्रोध से विषैले तत्व जन्म लेते है जो हमें अशांत रखते है व शरीर के लिए हानिकारक भी हैं | हास्य चिकित्सा से शरीर में विजातीय तत्वों का निष्कासन के साथ- साथ सकारात्मक विचारों का आगमन होता है |
हंसना और मुस्कुराना सरलतम प्रक्रियाएं है |जो हमारे साथ साथ सामने वालों को भी लाभान्वित करती हैं |
प्रसन्नता को हम प्रकृति में ऋतुराज वसंत की भी उपमा देते हैं " बसंत " में धरा अलंकृत हो मुस्कुराती है जो वसुधा के शृंगारित और हर्षित होने का सूचक है |
अवनि भी मुस्काई हम संग
सरसों भी बौराई संग संग
जीवन में छा गया "बसंत "
हंसना सहज प्रक्रिया है जो हमारे व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाती है ये एक ऐसी ऊर्जा " ज्यों खर्चे त्यों -त्यों बढ़े " के सिद्धांत पर चलती है........ हम स्वस्थ, हमारा रक्त संचार बढ़ेगा रक्त- परिभ्रमण अनुकूल होगा ..... ऑक्सीजन का अवशोषण बढ़ेगा विषैले तत्वों का निष्कासन तेजी से होगा ......नई ऊर्जा का संचार जो स्वास्थ्य के लिए उत्तम ....... हँसने से अंग- अंग फुर्तीले और शक्ति से भर जातें है, जिससे हमारी कार्यक्षमता में उत्तरोत्तर वृद्धि होती है | हँसी मनुष्य का नैसर्गिक गुण है हंसने से शुभ विचारों का प्रादुर्भाव होता है नकारात्मकता समाप्त होती है, मुस्कराहट मानव को शृंगारित ही नही करती सौंदर्य और सकारात्मक उष्मा से भी भरती है |

हंसने से चेहरा ओजवान ,स्फूर्तिवान , मननशील बनता है, सौहाद्रता और भाईचारा बढ़ता है, हँसते हुए कहे गए कटु वचन भी लोग हँसी में उड़ा देते हैं बड़े से बड़े बिगड़े हुए काम भी मुस्कुराने से बनते प्रतीत होते हैं |
जगत में सभी जन मोहक खिले सुमन सदृश्य मुस्कुराते रहे हँसते रहे तभी जीवन सफल, सरल और हम निरंतर आशावादी बने रहते हैं तो फिर हँसिये हँसाइये खुशियां बिखराइये। ...........आमीन....^^.....!!!
वंदना दुबे

Sunday, 16 April 2017

शिवपुत्री चिरकुंवारी "माँ रेवा" ( नर्म + दा =आनंददायनी) अमरकंटक से भई प्रगट अनुपम रूप निराला जन-जन चकित होये जाए रे....!
तेरा निर्मल -पावन सलिल, गांव -गांव से कानन -कानन कल-कल बहता जाए रे ...!
आनंददायनी, जीवनदायनी, अमृतप्रदायनी, मोक्ष प्रदायनी वेद -पुराण बताये रे ....!
जगत में प्राचीन काल से ही वसुधा सदैव पूज्यनीय रही है पूर्वज हर उन चीजों को पूजते थे, जिसे वह जीवन के लिये जरूरी मानते थे.. हमारी भारतीय संस्कृति में भी हम नदियों को माता और शिखरों को पिता समतुल्य मानते आये हैं |
मेरे बचपन के कुछ वर्ष "मंडला" में बीते पापा की पोस्टिंग थी वहां, जहां नर्मदा तीन और से घिरी हुयी है, मंडला का " हनुमान घाट" नितांत एकांत घनी अमराई से आच्छादित....... मेरा प्रिय स्थल था प्राथमिक शिक्षा मंडला में हुयी थी, आज भी चलचित्र से वे दिन मुझे कभी नही भूलते हैं ...........घाट पर घंटो पानी में पैर डालकर बैठना और अथाह , अविरल जल को अनवरत निहारना बचपन से आज तक पसंद है......... आज भी जब भी मंडला जाते हैं, “सहस्त्र धारा और हनुमानघाट “ जाना नहीं भूलती | पावन माँ नर्मदा के अद्भुत दर्शन से मस्तक श्रद्धा से झुक जाता है तब से ही एक गहरा लगाव उसके प्रति होता चला गया।
"कलकलनिनादिनि दुखनिवारिणि शांति दे माँ नर्मदे"
अमरकंटक से निकलने के बाद मंडला पहला बड़ा शहर जहां माँ नर्मदे विशाल रूप में अथाह जलराशि के साथ दृष्ट्रिगत होती हैं सबसे स्वच्छ जल भी उनका यहीं है , इसके बाद जबलपुर में " धुआँधार जलप्रपात" का विहंगम दृश्य......... ऊपर से नीचे देखने पर धवल-जल उबलता सा प्रतीत होता है, इतनी तीव्रता और वेग के साथ निर्मल जल ऊर्जा से भर देता है हमें .......ऊपर उठता धुँआ हमारे मस्तक के साथ-साथ अंतर्मन तक भिगो जाता है, देख सब हर्षित होते हैं |


नर्मदा जल में प्रवाहित लकड़ी एवं अस्थि कालांतर में पाषण रूप में परिवर्तित हो जाती थी नर्मदा अपने उदगम स्थान से लेकर समुद्र पर्यन्त उतर एवं दक्षिण दोनों तटों में,दोनों और सात मील तक धरा के अंदर ही अंदर प्रवाहित होती हैं , पृथ्वी के उपर तो वे मात्र दर्शनार्थ प्रवाहित होती हैं |
नर्मदा के "कंकड़ में शंकर" ऎसी मान्यता है नर्मदा में वर्ष में एक बार गंगा आदि समस्त नदियाँ स्वयं ही नर्मदा जी से मिलने आती हैं | नर्मदा राज राजेश्वरी हैं वे कहीं नहीं जाती हैं | " नर्मदे तत दर्शनाथ मुक्ति "
नर्मदा में समस्त तीर्थ वर्ष में एक बार नर्मदा के दर्शनार्थ स्वयं आते हैं | नर्मदा ही एक मात्र ऐसी देवी (नदी )हैं ,जो सदा हास्य मुद्रा में रहती है | आशुतोष (शिव ) ने ही उनका नाम "'नर्मदा " रखा था शिवपुत्री के अतिरिक्त " इला " नाम की शक्ति से भी सम्बोधित किया जाता है | नर्म = आनंद दा = देती रहो ( आनंदप्रदायनी )
असंख्य आस्थावान जनों को प्रत्यक्ष रूप से जीविका और आनन्द देने वाली नर्मदा के नाम से सबसे अधिक प्रसिद्ध है। नर्मदा की उत्पत्ति पुराणों के अनुसार भगवान शंकर की जटाओं से होने के कारण इनका नाम "जटाशंकरी" और "शिव पुत्री" के नाम से "भी विख्यात हैं |
"पुण्या कनखले गंगा, कुरुक्षेत्रे सरस्वती ग्रामे वा यदि वारण्ये, पुण्या सर्वत्र नर्मदा"
मत्स्यपुराण में नर्मदा की महिमा इस तरह वर्णित है -‘कनखल क्षेत्र में गंगा पवित्र है और कुरुक्षेत्र में सरस्वती। परन्तु गांव हो चाहे वन, नर्मदा सर्वत्र पवित्र है। यमुना का जल एक सप्ताह में, सरस्वती का तीन दिन में, गंगाजल उसी दिन और नर्मदा का जल उसी क्षण पवित्र कर देता है |
एक लोक गाथा के अनुसार नर्मदा और शोण भद्र की शादी होने वाली थी। विवाह मंडप में बैठने से ठीक एन वक्त पर नर्मदा को पता चला कि शोण भद्र की दिलचस्पी उसकी दासी (जुहिला) यह आदिवासी नदी मंडला के पास बहती है........ में अधिक है। विवाह मंडप से उठकर उनने आजीवन कुंवारी रहने का फैसला लिया भौगोलिक सत्य देखिए कि सचमुच नर्मदा भारतीय प्रायद्वीप की दो प्रमुख नदियों गंगा और गोदावरी से विपरीत दिशा में बहती है यानी पूर्व से पश्चिम की ओर जो इस कहानी को सत्य साबित करती है |

एक दूसरी कथा....... राक्षस सहस्त्र बाहु उन्हें अपने बस में करना चाहता था उनले बहाव को रोकना चाहता था, उनसे बचने के लिए वे "सहस्त्र धारा " बनकर निकल गयी और उसे शापित कर काला पाषाण बना दिया ये दर्शनीय स्थल " सहत्रधारा " के नाम से विख्यात है , राक्षस सहस्त्र बाहु भी काले पत्थर के रूप में विराजित हैं |

गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती। नर्मदा सिन्धु कावेरी जलेस्मिन सन्निधिं कुरु।। चिरकुंवारी नर्मदा .............
माघ मास के शुक्लपक्ष की सप्तमी तिथि को नर्मदा का आविर्भाव होने से प्रति वर्ष इस तिथि में नर्मदा जयन्ती बड़े धूमधाम से मनायी जाती है.। १३०० कि०मी० लम्बी धारा में एक साथ लाखों दीपक छोड़े जाते हैं तब एक स्वर्ग जैसा दृश्य दिखाई देता है। लाखों लोग श्रृद्धापूर्वक एकत्रित होकर "माँ रेवा" की आरती करते हैं.। होशंगाबाद जिसका पौराणिक नाम नर्मदापुरम् में नर्मदा जयन्ती का उत्सव अत्यन्त बृहद् स्तर पर आयोजित किया जाता है। सप्त सरिताओं की पवित्रता और स्नान की पावनता का बोध कराती है नर्मदा के उदगम अमरकण्टक से लेकर सागर संगम खम्बाद की खाड़ी तक असंख्य तीर्थ स्थल हैं।
माँ की महिमा और व्यापकता का यशोगान करना मेरा छोटा सा प्रयास है आप सब पढ़ें |
Vandana Dubey